दुर्लभ रोग दिवस: जागरूकता, संवेदनशीलता और सामूहिक जिम्मेदारी का आह्वान

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देवभूमि न्यूज 24.इन
विश्वभर में दुर्लभ रोग दिवस 28 फरवरी को मनाया जाता है मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य उन लाखों लोगों की पीड़ा, चुनौतियों और संघर्ष को सामने लाना है जो दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे हैं। भारत जैसे विशाल देश में भी हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके जीवन में दुर्लभ रोग किसी न किसी रूप में गहरी छाप छोड़ते हैं, किंतु जागरूकता और संसाधनों की कमी के कारण वे अक्सर हाशिये पर रह जाते हैं।
दुर्लभ रोग क्या हैं?
दुर्लभ रोग वे बीमारियां हैं जो बहुत कम लोगों को प्रभावित करती हैं। विश्व स्तर पर लगभग 7,000 से अधिक दुर्लभ रोग पहचाने जा चुके हैं। इनमें से अधिकांश आनुवंशिक (जेनेटिक) होते हैं और बचपन में ही प्रकट हो जाते हैं। उदाहरण के लिए थैलेसीमिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, हेमोफीलिया और कुछ प्रकार के कैंसर दुर्लभ रोगों की श्रेणी में आते हैं। इन रोगों का उपचार अत्यंत महंगा और जटिल होता है।
उपचार से अधिक चुनौती पहचान की
दुर्लभ रोगों के मामले में सबसे बड़ी समस्या समय पर पहचान (डायग्नोसिस) की होती है। कई बार मरीज वर्षों तक एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास भटकता रहता है। सही जांच और विशेषज्ञ उपचार केंद्रों की कमी स्थिति को और गंभीर बना देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो जागरूकता का स्तर और भी कम है, जिससे रोग का पता चलने में देर हो जाती है।
आर्थिक और सामाजिक बोझ
दुर्लभ रोगों का उपचार अक्सर अत्यधिक महंगा होता है। कई परिवार अपनी जीवनभर की कमाई खर्च कर देते हैं। कुछ उपचार तो करोड़ों रुपये तक के होते हैं। ऐसे में सरकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। केंद्र सरकार द्वारा “नेशनल पॉलिसी फॉर रेयर डिजीज” लागू की गई है, जिसके अंतर्गत आर्थिक सहायता और उपचार व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है, किंतु अभी भी व्यापक स्तर पर क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
समाज और सरकार की साझा जिम्मेदारी
दुर्लभ रोग केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता का भी प्रश्न है। मरीजों और उनके परिवारों को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होती है। स्कूलों, कार्यस्थलों और समुदायों में ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति और सहयोग का वातावरण बनाना जरूरी है।
सरकार को चाहिए कि—
अधिक से अधिक विशेष उपचार केंद्र स्थापित किए जाएं।
नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग अनिवार्य की जाए।
अनुसंधान (रिसर्च) को बढ़ावा दिया जाए।
बीमा योजनाओं में दुर्लभ रोगों को शामिल किया जाए।
निष्कर्ष
दुर्लभ रोग दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक संवेदनशील समाज के निर्माण का संकल्प है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि बीमारी भले ही दुर्लभ हो, पर पीड़ा वास्तविक है। आवश्यकता है कि हम जागरूक बनें, नीति निर्माण में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें और उन परिवारों के साथ खड़े हों जो इन चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
जब तक हर रोगी को समान अधिकार, उपचार और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक स्वास्थ्य व्यवस्था की पूर्णता अधूरी रहेगी। दुर्लभ रोग दिवस हमें यही संदेश देता है“कोई भी मरीज अकेला नहीं है।”

संपादक
जगत सिंह तोमर
देवभूमि न्यूज 24.इन