*देवभूमि न्यूज 24*
🪦कैलाश पर्वत पर संध्या का समय था। भगवान शिव ध्यान में लीन थे और माता पार्वती अपनी सखियों जया और विजया के साथ मानसरोवर के तट पर टहल रही थीं। उनके चरणों में जो पायल बंधी थी, वह साधारण पायल नहीं थी। वह विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई दिव्य पायल थी। उसकी प्रत्येक घुंघरू में एक मंत्र बंद था, और उसके प्रत्येक मोती में एक लोक की करुणा बंद थी।
जब माता पार्वती चलतीं, तो उस पायल की ध्वनि से कैलाश के पत्थर भी पिघल जाते, बर्फ के फूल खिल जाते और मंदाकिनी की धारा और अधिक मधुर हो जाती।
उस दिन माता नृत्य कर रही थीं। शिव के ध्यान को और गहरा करने के लिए, शिव की प्रसन्नता के लिए वे तांडव-लास्य का संगम प्रस्तुत कर रही थीं। उनके चरणों की गति के साथ ही पायल के घुंघरू बज रहे थे। तभी नृत्य की एक विशेष मुद्रा में, जब माता ने अपना पैर आकाश की ओर उठाया, तो पायल का एक मोती टूट कर नीचे गिर गया।
वह मोती साधारण नहीं था। वह मोती श्वेत नहीं, नील-श्वेत था। उसके भीतर जैसे पूरा आकाश बंद था। वह मोती कैलाश से गिरा, मेघों को चीरता हुआ, वायु के वेग से भी तीव्र गति से पृथ्वी की ओर आने लगा।
देवताओं ने उसे देखा तो भयभीत हो गए। इंद्र ने कहा, “यदि यह मोती सीधा पृथ्वी पर गिरा, तो पृथ्वी पर प्रलय आ जाएगा, क्योंकि इसमें देवी की शक्ति है।”
परन्तु भगवान शिव ने अपनी समाधि में से ही कहा, “नहीं, यह प्रलय नहीं, सृजन का बीज है। इसे गिरने दो। जहाँ यह गिरेगा, वहाँ एक नई आध्यात्मिक घटना आरम्भ होगी।”
वह मोती भारतवर्ष के मध्य में, नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक उजड़े हुए गाँव में गिरा। उस गाँव का नाम था – मोतीपुर, परन्तु वहाँ अब मोती जैसा कुछ नहीं बचा था। गाँव सूखा पड़ा था, लोग आपसी कलह में उलझे थे, मंदिर खंडहर बन चुके थे। गाँव के लोग धर्म को केवल कर्मकांड समझते थे।
मोती एक बंजर खेत में गिरा, जहाँ एक वृद्ध किसान, जिसका नाम हरिदास था, अपने सूखे खेत को देख कर रो रहा था। मोती उसके सामने गिरा। हरिदास ने उसे उठाया। उसने सोचा, यह कोई चमकदार पत्थर है। वह उसे अपने घर ले आया।
रात को जब उसने उस मोती को अपनी झोपड़ी में एक कोने में रखा, तो आश्चर्य हुआ।
उस मोती से प्रकाश निकलने लगा। वह प्रकाश दीये जैसा नहीं, चंद्रमा जैसा शीतल था। और उस प्रकाश में एक ध्वनि थी – पायल की ध्वनि – छन-छन।
हरिदास की पत्नी जाग गई। बोली, “यह ध्वनि कैसी?”
हरिदास ने कहा, “पता नहीं, इस मोती से आ रही है।”
अगली सुबह जब हरिदास उठा, तो उसने देखा कि उसकी झोपड़ी के बाहर एक तुलसी का पौधा उग आया है, जो कल तक नहीं था। और उस पौधे के चारों ओर वही मोती जैसा प्रकाश फैला हुआ था।
वह गाँव के लोगों को बुला लाया। लोग आए, परन्तु उन्हें वह प्रकाश नहीं दिखा, उन्हें केवल एक साधारण मोती दिखा। वे हँसे, “अरे हरिदास, यह तो काँच का टुकड़ा है। इसे मोती कह रहा है।”
परन्तु एक छोटी बालिका, जिसका नाम गौरी था, वह उस मोती को देखते ही रोने लगी। उसने कहा, “यह काँच नहीं, माँ की पायल का मोती है।”
सबने पूछा, “किस माँ की?”
गौरी ने कहा, “जगत की माँ की।”
गौरी उस गाँव की एक अनाथ बालिका थी। वह बोलती कम थी, परन्तु उसका हृदय बहुत पवित्र था। वह प्रतिदिन नर्मदा तट पर जाकर मिट्टी से शिव-पार्वती की मूर्तियाँ बनाती और फिर उन्हें नदी में विसर्जित कर देती।
जैसे ही गौरी ने उस मोती को छुआ, मोती और अधिक चमकने लगा और उससे एक बूँद जल टपकी। वह जल साधारण नहीं था, वह चरणामृत था। जहाँ वह बूँद गिरी, वहाँ की सूखी धरती गीली हो गई।
गाँव वालों ने यह देखा तो आश्चर्यचकित रह गए।
दूसरे दिन फिर एक घटना हुई। हरिदास के घर के सामने जो नीम का सूखा वृक्ष था, वह हरा होने लगा। उसकी डालियों से वही पायल की ध्वनि आने लगी, जैसे हवा चलने पर घुंघरू बज रहे हों।
तीसरे दिन गाँव के मंदिर में, जो वर्षों से बंद था, अपने आप घंटे बजने लगे। पुजारी ने जाकर देखा, तो गर्भगृह में वही मोती जैसा प्रकाश फैला था।
धीरे-धीरे गाँव में चर्चा फैल गई कि हरिदास के पास कोई दिव्य मोती है। लोग दूर-दूर से उसे देखने आने लगे। परन्तु आश्चर्य यह था कि वह मोती केवल उसी को अपना प्रकाश दिखाता था जिसके मन में छल-कपट नहीं होता। जो लोभी आते, उन्हें वह काँच का टुकड़ा ही लगता। जो पापी आते, उन्हें उसमें कुछ भी नहीं दिखता। परन्तु जो सच्चे हृदय से आते, उन्हें उसमें माता पार्वती की पायल की झलक दिखती।
एक दिन गाँव में एक विद्वान पंडित आया। उसने कहा, “यह सब अंधविश्वास है। मैं इस मोती की परीक्षा लूँगा।”
उसने मोती को हाथ में लिया और कहा, “यदि यह दिव्य है, तो इसे मेरे हाथ में जलना चाहिए, क्योंकि मैं महाज्ञानी हूँ।”
परन्तु मोती ने कोई प्रकाश नहीं दिया। पंडित ने क्रोध में उसे फेंक दिया। मोती गौरी की गोद में जा गिरा। गौरी की गोद में गिरते ही मोती से इतना प्रकाश निकला कि पूरा गाँव प्रकाशित हो गया। और उस प्रकाश में सबको एक दृश्य दिखा।
उन्होंने देखा – कैलाश पर माता पार्वती नृत्य कर रही हैं और उनके पायल से यह मोती गिर रहा है। और वह मोती गिरते-गिरते कह रहा है, “मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ प्रेम है, जहाँ करुणा है, जहाँ सच्ची भक्ति है।”
गाँव वालों की आँखों से पर्दा हट गया। वे समझ गए कि धर्म कर्मकांड में नहीं, हृदय की पवित्रता में है।
उस दिन से गाँव का नाम मोतीपुर से बदलकर पायलपुर हो गया। हरिदास के खेत में जहाँ मोती गिरा था, वहाँ एक छोटा सा कुण्ड बन गया। उस कुण्ड का जल आज भी श्वेत है और जब हवा चलती है, तो उसमें से पायल की छन-छन ध्वनि सुनाई देती है।
और वह मोती? वह मोती अब भी गौरी के पास है। गौरी अब बड़ी हो गई है और उस कुण्ड की सेविका है। वह कहती है, “यह मोती मेरा नहीं है, यह माता का है। यह केवल तब तक मेरे पास है जब तक मैं इसे अपना नहीं मानती। जिस दिन मैंने इसे अपना माना, यह फिर से कैलाश लौट जाएगा।”
🛑कहते हैं, पूर्णिमा की रात को जब नर्मदा के तट पर सन्नाटा होता है, तो आज भी उस कुण्ड से पायल की ध्वनि आती है। और जो उस ध्वनि को सुन लेता है, उसके मन के सारे कलह समाप्त हो जाते हैं।
माता पार्वती की पायल का एक मोती, जो नृत्य करते हुए गिरा था, उसने एक सूखे गाँव को फिर से हरा-भरा कर दिया। क्योंकि वह मोती पत्थर नहीं, माता की करुणा था। और करुणा जहाँ गिरती है, वहाँ आध्यात्मिक घटना अपने आप आरम्भ हो जाती है।
♿ऊँ_श्रीमहागौरीशंकराय_नम:♿
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱