नेताओं की घोषणाएं बदलीं, सरकारें बदलीं, सत्ता के चेहरे बदले; नहीं बदली तो सड़क की तस्वीर
कार्तिकेय तोमर
देवभूमि न्यूज 24
शिलाई : तीन दशक से ज्यादा समय से राजनीतिक घोषणाओं, आश्वासनों और सरकारी दावों के बीच फंसी क्यारी-गुंडाह–दवाईधार सड़क अब महज सड़क का मुद्दा नहीं रही है। यह उन तमाम घोषणाओं पर बड़ा सवाल बनकर खड़ी हो गई है, जो वर्षों से रेणुका जी और शिलाई के लोगों को सुनाई जाती रही हैं। सरकारें आती रहीं, सत्ता बदलती रही, नेताओं ने मंचों से सड़क बनाने के वादे किए, राशि स्वीकृत होने की बातें हुईं, लेकिन जनता आज भी उसी पुराने सवाल के साथ खड़ी है
आखिर सड़क बनेगी कब?
स्थानीय लोगों के मुताबिक इस सड़क की कहानी किसी एक सरकार की नाकामी तक सीमित नहीं है। प्रदेश के गठन के शुरुआती दौर से ही यह मार्ग क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। बुजुर्गों के अनुसार तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार भी रेणुका जी से शिलाई के बीच पैदल इसी मार्ग से आया-जाया करते थे और क्यारी में रात्रि विश्राम करते थे। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने इस मार्ग को क्षेत्र के विकास से जोड़ने का सपना देखा था।
इसके बाद दशकों का राजनीतिक इतिहास इस सड़क के नाम से जुड़ता चला गया। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 1987 के बाद रेणुका जी मेले में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के आने पर सड़क की घोषणा की चर्चा होती रही। बाद में प्रेम कुमार धूमल और जयराम ठाकुर के कार्यकाल में भी इस सड़क का मुद्दा राजनीतिक मंचों से उठाया गया। ग्रामीणों का दावा है कि जयराम ठाकुर के मुख्यमंत्री रहते हुए 10 लाख रुपये की राशि स्वीकृत हुई, लेकिन सवाल वही रहा—जब राशि स्वीकृत हुई तो सड़क जमीन पर क्यों नहीं दिखी?
घोषणा की राजनीति से बाहर निकलने की मांग
अब दोनों विधानसभा क्षेत्रों के लोगों का धैर्य जवाब देता नजर आ रहा है। युवाओं और महिलाओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से अभियान छेड़ दिया है। गांवों में चौपाल से लेकर शादी-पार्टियों तक सड़क की चर्चा हो रही है। युवाओं ने अपनी पुरानी सामाजिक व्यवस्था ‘खुमली’ का सहारा लेकर आंदोलन को गांवों तक पहुंचाने की कोशिश शुरू कर दी है।
क्यारी के कपिल, बलबीर सिंह, रूप सिंह, बबलू, मित्र सिंह, कुलदीप सिंह, संजू, यशपाल, विनोद कुमार और भीम सिंह सहित ग्रामीणों का कहना है कि अब किसी दल के मंच से एक और घोषणा सुनने की बजाय वे सड़क का वास्तविक निर्माण देखना चाहते हैं।
एक सड़क, दो विधानसभा क्षेत्र और दर्जनों पंचायतों का सवाल
क्यारी-गुंडाह–दवाईधार मार्ग बनने से शिलाई और रेणुका जी विधानसभा क्षेत्रों की दर्जनों पंचायतों को सीधा लाभ मिलने की संभावना है। ग्रामीणों के अनुसार इससे क्यारी-गुंडाह, बकरास, मिल्लाह, बिड़ला-दिगवा, कोटि-उतराऊ, कोटा-पाब, अश्याड़ी, टिटियाना, ठोटा-जाखल, बाम्बल, पाव-मानल सहित शिलाई क्षेत्र और छौऊ-भोगर, कोटि-धीमान, खुड़-दराबिल, चाढ़ना, भाटगढ़, जम्मू-कोटि, बांदल-सुराह, खाला-क्यार, कठवाड़, जरग, ऊंचा टिक्कर, देवना, बड़ग तथा संगड़ाह क्षेत्र की पंचायतों को बेहतर संपर्क मिल सकता है।
दावा है कि सड़क बनने के बाद क्यारी-गुंडाह से नाहन की दूरी करीब 65-70 किलोमीटर रह सकती है। इसका असर केवल आवागमन पर नहीं, बल्कि कृषि उत्पादों की आवाजाही, स्थानीय व्यापार, पर्यटन और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ेगा।
शिलाई को मिला बड़ा राजनीतिक ओहदा, अब परीक्षा सड़क की
इस मुद्दे ने वर्तमान सरकार के सामने भी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। करीब तीन दशक बाद शिलाई क्षेत्र के नेता हर्षवर्धन चौहान को प्रदेश सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है। यही कारण है कि अब लोगों की नजर उद्योग मंत्री और मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू पर है।
क्षेत्रवासियों के बीच सवाल तेजी से उठ रहा है कि अगर दशकों पुरानी इस सड़क को अब भी नहीं बनाया गया तो आखिर कब? लोगों का कहना है कि राजनीतिक दल चुनावों और मेलों में घोषणाओं के लिए इस सड़क को याद करते रहे हैं, लेकिन अब जनता घोषणा नहीं, काम का हिसाब चाहती है।
अब सवाल सीधा है घोषणा या निर्माण?
क्यारी-गुंडाह–दवाईधार सड़क की कहानी हिमाचल की उस राजनीतिक कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा करती है, जहां वर्षों तक विकास परियोजनाएं घोषणाओं में जिंदा रहती हैं और जमीन पर उनका इंतजार खत्म नहीं होता।
अब युवाओं के सोशल मीडिया अभियान और गांवों की ‘खुमली’ ने इस पुराने मुद्दे को फिर जिंदा कर दिया है। तीन दशक की घोषणाओं के बाद जनता अब भाषण नहीं, मशीनें और सड़क निर्माण शुरू होते देखना चाहती है।
इस बार सवाल किसी एक पार्टी से नहीं हर उस सरकार और हर उस नेता से है, जिसने इस सड़क का नाम लिया है आखिर घोषणा से आगे कब बढ़ेगा काम?