देवभूमि न्यूज 24 / धर्म-अध्यात्म
हिन्दू पारिवारिक व्यवस्था में कुल देवता और कुलदेवी का स्थान सदैव से महत्वपूर्ण रहा है। प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी ऋषि का वंशज है, जिससे उसके गोत्र का पता चलता है। हमारे पूर्वजों ने अपने कुल की रक्षा के लिए उपयुक्त कुल देवता या कुलदेवी का चुनाव कर उनकी पूजा शुरू की थी।
मान्यता है कि कुल देवी-देवता एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति के रूप में परिवार की नकारात्मक शक्तियों, ऊर्जाओं और वायव्य बाधाओं से रक्षा करते हैं, ताकि परिवार निर्विघ्न उन्नति कर सके।
क्यों भूल जाते हैं लोग कुलदेवी-देवता को?
समय के साथ परिवारों के पलायन, धर्म परिवर्तन, आक्रांताओं के भय से विस्थापन, जानकार व्यक्ति के असमय निधन, संस्कारों के क्षय और आधुनिकता के कारण बहुत से परिवार अपने कुल देवता/देवी को भूल गए। शहरों में रहने वाले परिवारों में यह समस्या अधिक देखी जाती है।
पूजा छोड़ने से क्या होता है?
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, कुल देवता/देवी की पूजा छोड़ने के कुछ वर्षों तक तो कोई खास अंतर नहीं दिखता, लेकिन जब सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाएं, नकारात्मक ऊर्जा, वायव्य बाधाएं, उन्नति में रुकावट, संस्कारों का क्षय, कलह और अशांति शुरू हो जाती है।
कुल देवता या देवी हमारे सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधा से पहले संघर्ष करते हैं। ये ही किसी भी इष्ट को दी जाने वाली पूजा को इष्ट तक पहुंचाते हैं। यदि इन्हें पूजा नहीं मिलती तो ये नाराज या निर्लिप्त हो सकते हैं, और तब की गई पूजा इष्ट तक नहीं पहुंचती।
पूजा कब करनी चाहिए?
सामान्यतः इनकी पूजा वर्ष में एक या दो बार निश्चित समय पर होती है, जो हर परिवार के अनुसार भिन्न होती है। शादी-विवाह, संतानोत्पत्ति जैसे शुभ अवसरों पर इन्हें विशेष पूजाएं भी दी जाती हैं।
अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने कुल देवता या देवी को जानना चाहिए और यथायोग्य पूजा प्रदान करनी चाहिए, जिससे परिवार की सुरक्षा और उन्नति बनी रहे।
साभार: ज्यो: शैलेंद्र सिंगला
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