लेखिका: ममता सक्सेना चित्रांश
स्थान: कोसीकलां, मथुरा (उत्तर प्रदेश)
*देवभूमि न्यूज 24*
एक छोटे से शहर में एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अपने परिवार के साथ रहने आए। नौकरी के दौरान बड़े पद, प्रतिष्ठा और अधिकारों के बीच जीवन बिताने वाले इस अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन रास नहीं आ रहा था।
हर शाम वे अपने घर के पास स्थित पार्क में टहलने जाते। वहां मौजूद लोगों को तिरस्कार भरी नजरों से देखते और किसी से बातचीत करना अपनी शान के खिलाफ समझते।
एक दिन पार्क में उनकी मुलाकात एक बुजुर्ग से हुई। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत होने लगी। अब अधिकारी प्रतिदिन उस बुजुर्ग के पास बैठने लगे, लेकिन उनकी बातचीत का विषय हमेशा एक ही होता था।
वे कहते, “मैं इतना बड़ा आईएएस अधिकारी था। मेरा कितना रुतबा था! मुझे तो दिल्ली में बसना चाहिए था, लेकिन मजबूरी में इस छोटे से शहर में आकर रहना पड़ रहा है।”
बुजुर्ग शांतिपूर्वक उनकी बातें सुनते रहते।
एक दिन अधिकारी की पद और प्रतिष्ठा को लेकर बार-बार की जाने वाली बातों से परेशान होकर बुजुर्ग ने उनसे एक सवाल पूछा।
“साहब, आपने कभी फ्यूज हुआ बल्ब देखा है?”
अधिकारी ने कहा, “हां, देखा है।”
बुजुर्ग ने पूछा, “जब कोई बल्ब फ्यूज हो जाता है, तो क्या कोई यह देखता है कि वह किस कंपनी का था? कितने वाट का था? उससे कितनी रोशनी होती थी? या वह कितना महंगा था?”
अधिकारी ने सहजता से जवाब दिया, “नहीं, फ्यूज होने के बाद इन बातों का कोई महत्व नहीं रह जाता।”
बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, “बस साहब, जिंदगी का सच भी यही है। सेवानिवृत्ति के बाद हम सभी की स्थिति कुछ ऐसी ही हो जाती है। हमने किस पद पर काम किया, हमारे पास कितनी शक्तियां थीं, हमारा कितना रुतबा था ये बातें धीरे-धीरे पीछे छूट जाती हैं।”
फिर उन्होंने सामने बैठे कुछ लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा, “मैं इस सोसाइटी में कई वर्षों से रह रहा हूं। शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मैं दो बार सांसद रह चुका हूं। सामने बैठे वर्मा जी रेलवे में महाप्रबंधक थे। उधर से आ रहे सज्जन सेना में ब्रिगेडियर रहे हैं और बैरवा जी इसरो में वरिष्ठ पद पर कार्यरत थे।”
“लेकिन हमने कभी इन पदों का ढिंढोरा नहीं पीटा। हम सब जानते हैं कि जब बल्ब फ्यूज हो जाता है, तो उसकी पहचान उसके वाट या कंपनी से नहीं होती। चाहे वह जीरो वाट का हो या सौ वाट का, रोशनी देना बंद कर देने के बाद उसका उपयोग समाप्त हो जाता है।”
बुजुर्ग की बातों में गहरा जीवन-दर्शन छिपा था।
उन्होंने आगे कहा, “साहब, बहुत से लोग अपने पद और अधिकारों को ही अपनी असली पहचान मान बैठते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे अपने पुराने रुतबे से बाहर नहीं निकल पाते। घर के बाहर लगी नेमप्लेट पर ‘सेवानिवृत्त आईएएस’, ‘सेवानिवृत्त आईपीएस’, ‘सेवानिवृत्त पीसीएस’ या ‘सेवानिवृत्त न्यायाधीश’ लिखकर वे बार-बार दुनिया को अपने अतीत की याद दिलाना चाहते हैं।”
“इसमें कोई बुराई नहीं कि आपने बड़ा पद हासिल किया या अपने जीवन में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त कीं। लेकिन असली सवाल यह है कि पद पर रहते हुए आप कैसे इंसान थे? आपने कितने जरूरतमंदों की मदद की? कितने लोगों को न्याय दिलाया? समाज के लिए क्या किया? आपके व्यवहार से कितने लोगों को सम्मान मिला?”
बुजुर्ग कुछ पल रुके और फिर बोले
“साहब, पद आपको अधिकार देता है, लेकिन आपका व्यवहार आपको सम्मान दिलाता है। कुर्सी पर बैठकर लोग आपको सलाम कर सकते हैं, मगर दिल में जगह आपके अच्छे कर्म ही बनाते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “जब कभी पद और सत्ता का घमंड मन में आए, तो बस इतना याद कर लेना कि एक दिन हर पद छूट जाएगा। अधिकार समाप्त हो जाएंगे और कुर्सी किसी दूसरे के पास चली जाएगी। तब आपके साथ केवल आपके कर्म और लोगों के दिलों में बनी आपकी छवि ही रह जाएगी।”
बुजुर्ग की बातें सुनकर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी स्तब्ध रह गए। उनकी नजरें झुक गईं। पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि वे अपने बीते हुए पद के अहंकार में वर्तमान जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई को भूल बैठे थे।
उस दिन के बाद उनके व्यवहार में बदलाव आने लगा। अब वे पार्क में लोगों से मुस्कुराकर मिलते, उनकी बातें सुनते और जरूरत पड़ने पर उनकी मदद भी करते।
उन्हें समझ आ गया था कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बड़ा अधिकारी बनना नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनना है।
कहानी से सीख
यह लघुकथा उन सभी लोगों के लिए एक आईना है, जो पद और सत्ता में रहते हुए अपनी शक्तियों का उपयोग दूसरों के हित में नहीं करते, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद समाज से सम्मान और प्रतिष्ठा की अपेक्षा रखते हैं।
याद रखिए, पद अस्थायी है, लेकिन अच्छे कर्मों से अर्जित सम्मान स्थायी होता है।
अगर आप किसी महत्वपूर्ण पद पर हैं, तो अपनी कलम, अपने अधिकारों और अपनी शक्ति का उपयोग जरूरतमंदों की मदद के लिए कीजिए। अपने पद रूपी बल्ब से समाज और देश को रोशन कीजिए।
क्योंकि जब पद का बल्ब फ्यूज हो जाता है, तब यह नहीं देखा जाता कि वह कितने वाट का था, बल्कि यह याद किया जाता है कि उसने अपने जीवनकाल में कितनी रोशनी दी थी।
इसलिए पद पर रहते हुए ऐसे कर्म कीजिए कि सेवानिवृत्ति के बाद भी लोग आपके पद के कारण नहीं, बल्कि आपके व्यक्तित्व और आपके अच्छे कार्यों के कारण आपका सम्मान करें।
लेखिका: ममता सक्सेना चित्रांश
कोसीकलां, मथुरा (उत्तर प्रदेश)
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