हिंदू धर्म में स्नान का महत्व, जानिए स्नान के बाद शरीर पोंछने को लेकर क्या कहता है शास्त्र – ज्योतिषाचार्य शैलेन्द्र सिंगला पलवल, हरियाणा

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    *देवभूमि न्यूज 24*

हिंदू धर्म में स्नान को केवल शरीर की स्वच्छता का साधन ही नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया है। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में स्नान की विधि, उसके नियमों तथा स्नान के बाद किए जाने वाले कार्यों का उल्लेख मिलता है।

एक प्राचीन धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्नान के बाद शरीर पर लगे जल को स्वयं सूखने देना शुभ माना गया है। हालांकि, यह एक पारंपरिक धार्मिक मान्यता है, जिसे अपनी सुविधा, स्वास्थ्य और परिस्थितियों के अनुसार समझना चाहिए।

आचार्य गोभिल के नाम से उद्धृत श्लोक:

पिबन्ति शिरसो देवाः पिबन्ति पितरो मुखात्।
मध्यतः सर्वगन्धर्वा अधस्तात् सर्वजन्तवः॥

तस्मात् स्नातो न निर्मुयात् स्नानशाट्या न पाणिना।
त्रयः कोट्योऽर्धकोटी च यावन्त्यमहाणि वै।
वसन्ति सर्वतीर्थानि तस्मान्न परिमार्जयेत्॥

इस शास्त्रीय उद्धरण के माध्यम से स्नान के बाद शरीर को न पोंछने की पारंपरिक मान्यता का उल्लेख किया गया है।

🌿 यदि शरीर पोंछना आवश्यक हो तो क्या करें?

धार्मिक ग्रंथों में शारीरिक क्षमता और परिस्थिति के अनुसार विकल्पों का भी उल्लेख मिलता है। यदि किसी व्यक्ति के लिए शरीर पर लगे जल को स्वयं सूखने देना संभव न हो, तो वह अपनी सुविधा के अनुसार स्वच्छ तौलिए या वस्त्र का उपयोग कर सकता है।

देवल ऋषि के नाम से उद्धृत श्लोक:

अङ्गानि शक्तो वस्त्रेण पाणिना न च मार्जयेत्।
धौताम्बरेण वा प्रोच्छ्य विभृयाच्छुष्कवाससी॥

इस उद्धरण में शरीर को पोंछने और स्नान के बाद सूखे वस्त्र धारण करने से संबंधित निर्देश का उल्लेख मिलता है।

🙏 गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान की मान्यता

हिंदू धर्म में गंगा सहित अन्य पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु ऐसी जगहों पर स्नान करते समय संबंधित धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं।

हालांकि, शरीर को न पोंछने की परंपरा का पालन करते समय मौसम, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुविधा का ध्यान रखना भी आवश्यक है। विशेष रूप से ठंड के मौसम में गीले शरीर को लंबे समय तक छोड़ना उचित नहीं है।

🌺 दूसरों के लिए स्नान करने की धार्मिक परंपरा

कुछ धार्मिक परंपराओं में माता-पिता, गुरु, भाई, मित्र अथवा अन्य व्यक्तियों के निमित्त स्नान और संकल्प करने का उल्लेख मिलता है।

मान्यता के अनुसार, किसी अन्य व्यक्ति के निमित्त किए गए धार्मिक स्नान का पुण्य उस व्यक्ति को भी प्राप्त हो सकता है। कुछ शास्त्रीय परंपराओं में ऐसे स्नान के पुण्य का एक निश्चित अंश मिलने की बात कही गई है।

इस संदर्भ में जीवित और दिवंगत व्यक्तियों के निमित्त किए जाने वाले धार्मिक कर्मों की विधियां अलग-अलग बताई गई हैं।

  1. जीवित व्यक्ति के निमित्त स्नान:
    परंपरा के अनुसार, संबंधित व्यक्ति का नाम लेकर संकल्प किया जाता है और उसके कल्याण की कामना की जाती है।
  2. दिवंगत व्यक्ति के निमित्त स्नान:
    कुछ धार्मिक विधियों में कुश का उपयोग करके दिवंगत व्यक्ति का स्मरण किया जाता है और निर्धारित मंत्रों के साथ धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है।

इन विधियों का पालन संबंधित परंपरा और योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में किया जा सकता है।

🌼 स्नान के बाद स्वच्छता का भी रखें ध्यान

धार्मिक आस्था के साथ-साथ शारीरिक स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है। स्नान के बाद स्वच्छ, सूखे वस्त्र धारण करें। ठंड के मौसम में शरीर को गीला न छोड़ें और आवश्यकता होने पर तौलिए से अच्छी तरह पोंछ लें।

धार्मिक नियमों और परंपराओं को समझते समय उनके मूल संदर्भ तथा प्रचलित व्याख्याओं में अंतर का ध्यान रखना चाहिए।

🙏 !! श्री हरिः शरणम् !! 🙏

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