जयंती पर विशेष:भारत के जिल्दसाज : सरदार वल्लभभाई पटेल- डॉ. विवेकानंद उपाध्याय वरिष्ठ स्तंभकार, देवरिया

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देवभूमि न्यूज 24

इतिहास में कुछ व्यक्तित्व केवल किसी तिथि या घटना तक सीमित नहीं रहते, बल्कि एक विचार और दृष्टि बन जाते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल ऐसे ही दृष्टि-पुरुष थे। उन्हें केवल स्वतंत्रता सेनानी कहना, सागर को केवल पानी कहना है। वे भारत नामक महाग्रंथ के जिल्दसाज थे, जिन्होंने बिखरे हुए पन्नों को एक सूत्र में पिरोकर ऐसा मजबूत ग्रंथ तैयार किया, जिसके पन्ने आज भी एकता और अखंडता का संदेश देते हैं।

31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे उस बालक का भारत की एकता का पर्याय बनना इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। साहित्यिक रूपक में देखें तो भारत की स्वतंत्रता एक महाकाव्य थी। महात्मा गांधी इसके ऋषि थे, जिन्होंने सत्य और अहिंसा का मंत्र दिया। जवाहरलाल नेहरू इसके स्वप्नद्रष्टा थे, जिन्होंने भविष्य का नक्शा खींचा। मौलाना अबुल कलाम आजाद इसके स्वर थे, जिन्होंने गंगा-जमुनी तहजीब की आवाज बुलंद की। लेकिन सरदार पटेल इस महाकाव्य के सूत्रधार बने, जिन्होंने इसे बिखरने से बचाने का दायित्व निभाया।

1947 का भारत एक अधूरी पांडुलिपि की तरह था। अंग्रेज जाते-जाते देश को 562 से अधिक रियासतों की जटिल विरासत सौंप गए थे। यह केवल रियासतों की संख्या का सवाल नहीं था, बल्कि भारत की एकता और अखंडता के सामने खड़ी बड़ी चुनौती थी। अनेक रियासतें अपने भविष्य को लेकर अलग-अलग निर्णय लेना चाहती थीं। कोई स्वतंत्र रहने की बात कर रही थी, तो किसी के पाकिस्तान में शामिल होने की संभावना जताई जा रही थी। ऐसे समय में भारत एक संगठित राष्ट्र के बजाय बिखरे हुए शब्दों के ढेर जैसा दिखाई दे रहा था।

इसी कठिन दौर में पटेल ने जिल्दसाज की भूमिका निभाई। जिल्दसाज के पास न नया कागज होता है और न नई स्याही। उसके पास होती है सुई, धागा, गोंद और जोड़ने का हुनर। पटेल के पास भी सीमित समय और अनेक चुनौतियां थीं। उनके सहयोगी वी.पी. मेनन, उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और निर्णय लेने की क्षमता ने इस ऐतिहासिक कार्य को आगे बढ़ाया। उन्होंने बिखरी हुई रियासतों को एक सूत्र में जोड़कर भारत की राजनीतिक एकता को मजबूत आधार दिया।

रियासतों के एकीकरण के लिए पटेल ने परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग रास्ते अपनाए। कहीं रियासतों का पड़ोसी प्रांतों में विलय कराया गया, कहीं कई रियासतों को मिलाकर सौराष्ट्र और मध्य भारत जैसे संघ बनाए गए, तो कहीं कुछ रियासतों को अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में रखा गया। राजाओं को विश्वास में लेने के लिए प्रिवी पर्स, निजी संपत्ति और राजप्रमुख जैसे प्रावधान भी महत्वपूर्ण बने। यह केवल राजनीतिक समझौते की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि विश्वास और व्यावहारिक दूरदर्शिता के सहारे राष्ट्रीय एकीकरण का प्रयास था।

हालांकि, हर जगह सहमति से रास्ता नहीं निकला। हैदराबाद और जूनागढ़ जैसी रियासतों के प्रश्न विशेष रूप से जटिल थे। इन परिस्थितियों में पटेल ने दृढ़ता और प्रशासनिक निर्णय क्षमता का परिचय दिया। हैदराबाद में 13 से 17 सितंबर, 1948 तक चलाया गया ‘ऑपरेशन पोलो’ भारतीय संघ में उसके विलय की दिशा में निर्णायक साबित हुआ। इस प्रकार राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में संवाद, समझौते और आवश्यकतानुसार कठोर निर्णय तीनों की भूमिका रही।

उन्हें ‘लौह पुरुष’ कहना केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व का जीवंत रूपक है। लोहे से हल बनता है, जो बंजर धरती को चीरकर अन्न उगाने का रास्ता तैयार करता है। इसी लोहे से ढाल भी बनती है, जो राष्ट्र की रक्षा करती है। पटेल के व्यक्तित्व में ये दोनों गुण दिखाई देते थे। वे बाहर से वज्र की तरह दृढ़, लेकिन भीतर से किसान की मिट्टी की तरह संवेदनशील थे।

बारडोली सत्याग्रह के दौरान किसानों के अधिकारों के लिए उनके नेतृत्व ने उन्हें ‘सरदार’ की पहचान दिलाई। वहां उन्होंने आम किसानों को संगठित कर यह विश्वास जगाया कि एकजुट होकर अन्याय का सामना किया जा सकता है। वहीं, राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर उन्होंने दृढ़ता का परिचय दिया। परिस्थितियों के अनुसार उनका यही दृढ़ व्यक्तित्व राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए सामने आया।

पटेल मितभाषी व्यक्ति थे। वे कम बोलते थे, लेकिन उनके कार्य उनकी सोच और संकल्प को अभिव्यक्त करते थे। स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं को देश की प्रशासनिक एकता के लिए आवश्यक माना। इसी संदर्भ में सिविल सेवाओं को भारत का ‘स्टील फ्रेम’ कहा गया, जो आज भी प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूती का प्रतीक माना जाता है।

आज नर्मदा नदी के तट पर स्थापित ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ केवल एक विशाल प्रतिमा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता का प्रतीक है। 182 मीटर ऊंची यह प्रतिमा हमें याद दिलाती है कि जिस एकता को स्थापित करने के लिए सरदार पटेल ने अपना जीवन और ऊर्जा समर्पित की, उसे बनाए रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

आज जब समाज में विचारों, जातियों, भाषाओं और विभिन्न पहचानों के आधार पर मतभेद सामने आते हैं, तब पटेल का एकता का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। विविधता भारत की पहचान है, लेकिन इस विविधता के बीच आपसी सम्मान, संवाद और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

एकता कोई सरकारी फाइल नहीं है, जिस पर एक बार हस्ताक्षर हो जाएं और जिम्मेदारी पूरी हो जाए। एकता एक नदी है, जिसे निरंतर प्रवाहित रखना पड़ता है। एकता एक कविता है, जिसे हर पीढ़ी को अपने आचरण और संकल्प से फिर लिखना पड़ता है।

सरदार पटेल ने भारत को एक सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने पहली पंक्ति लिखी हम सब भारतीय हैं। अब उस पंक्ति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी है। यही उस महान ‘जिल्दसाज’ को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिसने बिखरे पन्नों को जोड़कर भारत को एक अखंड राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

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