शख्सियत”बरहज के विशारद से पद्मश्री तक”- डॉ. विवेकानंद उपाध्यायवरिष्ठ स्तंभकार, (देवरिया)

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*देवभूमि न्यूज 24*

डॉ. रामदरश मिश्र हिंदी साहित्य में उस सेतु के समान हैं जिसने गाँव की माटी की सोंधी गंध को शहर की भागती हुई संवेदना से, परम्परा की गहराई को आधुनिकता के बोध से और कविता की कोमलता को कथा के यथार्थ से एक साथ जोड़ा है। 15 अगस्त 1924 को गोरखपुर जिले के डुमरी गाँव में जन्मे मिश्र जी केवल लेखक नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत के बनते बिगड़ते समाज के पूरे युग के साक्षी और भोक्ता हैं। उनकी यात्रा बरहज के विशारद से पद्मश्री तक की असाधारण यात्रा है जो हिंदी के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई लेकिन हिंदी के संस्कार की असली नींव बरहज में पड़ी। बरहज (देवरिया) के राष्ट्रभाषा हिंदी महाविद्यालय से हिंदी का ज्ञान अर्जन करने वाले डॉ. मिश्र आगे चलकर हिंदी के शिखर पुरुष बने और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से दिल्ली विश्वविद्यालय तक हिंदी की पताका फहराते हुए पद्मश्री सम्मान तक पहुँचे। बरहज उनकी साहित्यिक जीवन की प्रथम प्रयोगशाला था जहाँ उन्होंने विशारद और साहित्यरत्न की परीक्षाएँ विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण कीं। बरहज (देवरिया) तब पूर्वांचल में हिंदी शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र था। इस बात का उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा सहचर है समय में एक पूरा अध्याय देकर किया है जहाँ उन्होंने बरहज को हिंदी के शास्त्रीय अनुशासन और संस्कार की नींव बताया है। इसी में उन्होंने अपने गुरु पंडित सिंहासन तिवारी कांत पर लिखा है जिनकी प्रेरणा ने उनमें कविता के बीज बोए और हिंदी के प्रति अटूट निष्ठा जगाई।

बरहज (देवरिया) के बीज ने उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय पहुँचाया जहाँ उन्हें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का सान्निध्य मिला और फिर वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। हिंदी में उनके आजीवन योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2025 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया, जो साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। इससे पहले उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2015 और व्यास सम्मान 2021 सहित अनेक सम्मान मिल चुके थे।

मूलतः वे कवि हृदय हैं। पथिक से लेकर बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ, पक गई है धूप और कंधे पर सूरज तक उनकी काव्य यात्रा चली है। उनकी कविता सीधी, सरल और जीवन के ताप में पकी रोटी जैसी है जो हृदय को छूती है। वे शहरी मध्यवर्ग के अकेलेपन, महानगर के किराये के कमरे में रहने वाले युवक की बेरोजगारी, दफ्तर की ऊब और छूट गए रिश्तों के बिखराव को आत्मीयता से पकड़ते हैं। यही सहजता उन्हें नई कविता की भीड़ से अलग बनाती है और बड़ा कवि सिद्ध करती है।

उनका कालजयी उपन्यास जल टूटता हुआ स्वतंत्रता के बाद गाँव में टूटते सामंती मूल्यों, जमींदारी अवशेष और जातीय जकड़न का जीवंत चित्रण है जो प्रेमचंद के बाद विरल है। बीच का समय, सूखता हुआ तालाब, अपने लोग, दूसरा घर और साहित्य अकादमी पुरस्कृत आग की हँसी महानगर में दूसरे घर की तलाश, संबंधों के क्षरण और फिर भी जीवन में बची आस्था की कथा हैं। उनकी कहानियाँ खाली घर, एक वह और सहचर मध्यवर्ग की चुप्पियों में छिपी करुणा को उजागर करती हैं।

मिश्र जी की भाषा में पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोली की मिठास है। वे किसी वाद में नहीं बंधे, जैसा जिया वैसा लिखा। 31 अक्टूबर 2025 को 101 वर्ष की आयु में दिल्ली के द्वारका स्थित आवास पर उनका निधन हो गया। बरहज (देवरिया) का वह दौर उनके जीवन में अनुशासन, सादगी और हिंदी प्रेम का काल था जिसने उन्हें साहित्य साधना के लिए तैयार किया और यही संस्कार उनके लेखन में निरंतर झलकता है। गाँव से बरहज (देवरिया), काशी होते हुए महानगर तक की उनकी यात्रा हिंदी समाज की ही यात्रा है। इसीलिए बरहज के राष्ट्रभाषा हिंदी महाविद्यालय का एक सामान्य छात्र जब पद्मश्री तक पहुँचता है तो सिद्ध होता है कि मातृभाषा के प्रति निष्ठा ही सबसे बड़ा सम्मान है।

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