देवभूमि न्यूज 24
महंगाई आज आम आदमी के जीवन की सबसे बड़ी परेशानी बनती जा रही है। रसोई से लेकर बाजार तक हर चीज के बढ़ते दाम ने लोगों का बजट बिगाड़ दिया है। इसी ज्वलंत समस्या को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से अपनी रचना में प्रस्तुत किया है कवयित्री ममता सक्सेना ने। उनकी कविता में आम आदमी की परेशानी के साथ-साथ रोजमर्रा के जीवन की ऐसी सच्चाई झलकती है, जो चेहरे पर मुस्कान भी लाती है और सोचने पर भी मजबूर करती है।
महंगाई ने निकाला दीवाला
महंगाई ने ऐसा निकाला दीवाला, जेब में बचा न एक भी निवाला।
प्याज ने रुलाया, टमाटर ने हँसाया, आलू ने तो सबका भाव बढ़ाया।
दाल-चावल हुए सोने से महंगे, भाव देखकर उड़ गए सबके होश के पंछी।
पेट्रोल देखकर पति बोले, साइकिल ही ठीक है, पत्नी बोली, पैदल चलो, यही अब नसीब है।
सब्जी वाली बोली, भाव मत पूछो बहन, धनिया भी अब बिक रहा सोने के भाव में।
बच्चे बोले पापा, पिज्जा मँगवा दो, पापा बोले बेटा, दाल-रोटी ही खा लो।
सैलरी आती है, जाती है हवा की तरह, महीना कटता है जैसे कटे सजा की तरह।
महंगाई की मार से सब हुए बेहाल, हँसते-हँसते रो पड़े, ये है महंगाई का कमाल।
ममता कहे, अब तो बस यही दुआ है, महंगाई घटे और घर में खुशहाली आए।
रचनाकार: ममता सक्सेना कोसीकलां, मथुरा (उत्तर प्रदेश)
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