महाराणा प्रताप की महिमा व शौर्य गाथा
देवभूमि न्यूज डेस्क
सरकाघाट (हि. प्र.)
महाराणा प्रताप
बताऊं मैं इनकी महिमा, करूं मैं शौर्य का गुणगान
उससे पहले महाराणा प्रताप जी को, इनकी जयंती पर अनु का कोटि-कोटि प्रणाम।
महाराणा प्रताप जी का बचपन में नाम था कीका,
पड़ गया इनके शौर्य के आगे बड़े-बड़े योद्धाओं का पराक्रम फीका।
मनाई जाती है इनकी जयंती जेष्ठ मास, शुक्ल पक्ष,तिथि तृतीय
इनके शौर्य की गाथा आज भी हमारे इतिहास में है अद्वितीय।
डील-डौल काफी लंबा -चौड़ा 7 फुट की ऊंची कद काठी ,
मरते दम तक साथ निभाया इनका, रामप्रसाद हाथी और घोड़ा चेतक साथी।
महाराणा प्रताप का कवच वजन 72 किलो, 81 किलो भाला,
ढाल,तलवार को मिलाकर 208 किलो का वजन, हर वक्त संभाला।
अकबर ने भेजे कई संदेशे, दिए कई प्रलोभन,मगर
महाराणा जी ने कर दिए सारे नामंजूर,
कहा आत्मसम्मान के साथ जीना है, नहीं है तुमको कहना जी हुजूर।
मन में महाराणा जी ने ठान ली,ले ली एक शपथ,
जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा,
महलों को छोड़ जंगलों में वास करेंगे,
भले ही स्वादिष्ट भोजन को छोड़कर, कंद- मूल,फल-फूल,घास से पेट भरेंगे।
अकबर को भी हो गया था इस बात का एहसास,
झुका नहीं पाया जब स्वामी भक्त हाथी को तो,
महाराणा प्रताप को झुकाने के भी विफल होंगे प्रयास।
कहते हैं अकबर भी इनकी मौत की खबर सुन रोया था,
महान योद्धा, सच्चा मातृभूमि सेवक जब हमने खोया था।
सुनो- सुनाओ ऐसे महान वीरों के शौर्य पराक्रम के किस्से ,
ना रुकेंगे,ना झुकेंगे बना लो ऐसे आदर्शों को अपने जीवन के हिस्से।
अनु ठाकुर
टिहरा सरकाघाट
हिमाचल प्रदेश