श्री मद्भागवत महापुराण कथा में अमृतकथा की सरस धारा का व्यासपीठ आचार्य श्री गणेश दत्त शास्त्री जी द्वारा संचार।
देवभूमि न्यूज डेस्क
अंदोरा-गगरेट
श्री छोटा हरिद्वार उपनाम से प्रसिद्ध श्री राम मंदिर अंदौरा-गगरेट सन्निकट सोमभद्रा-स्वां नदी में आचार्य श्री गणेश दत्त शास्त्री जी ने श्री मद्भागवत महापुराण कथा प्रसंग में आज द्वितीय दिवस अमृतकथा का सरस संचार करा समस्त श्रोताओं को भक्ति रस से भाव विभोर कर दिया। ब्रह्मा के मानस पुत्र श्री नारद जी ने माता पार्वती को एक रहस्यमय प्रसंग सुनाकर संशयात्मक बना दिया। नारद जी ने माता पार्वती को बताया कि भगवान शंकरजी के गले में नरमुंडो का रहस्य आपको अवश्य ही जानना चाहिए।माता पार्वती जी ने इसका रहस्योद्घाटन करने का नारद जी से पुरजोर आग्रह किया। नारद जी ने इस बारे असमर्थता जताई कि इस संशय का रहस्योद्घाटन तो स्वयंमेव सदाशिव शंकर जी ही कर सकते हैं।
नारद जी नारायण नारायण कहते हुए चल दिए। रास्ते में शंकर जी मिले तो नारद जी ने भगवान शंकर जी को प्रणाम किया और आग्रह किया कि माता पार्वती जी बड़ी बेसब्री से उनकी बाट जोह रही है। त्रिलोकीनाथ भगवान शंकर जी ने अनुमान लगा लिया कि आज देव ऋषि नारद कोई ना कोई जबरदस्त ज्वाला भड़का गये हैं। शंकर जी ने जैसे ही कैलाश पर्वत में प्रवेश किया तो माता पार्वती जी ने प्रश्न किया कि हे भूत भावन भगवान जगत स्वामी परमेश्वर जी! कृपया मुझे अपने गले में नरमुंडो के धारण करने का रहस्य समझाईये? शंकर जी ने कहा कि इसके लिए देवी पार्वती आपको आंखें मूंद कर सात दिनों तक अमृतकथा का श्रवण करना होगा। यह भी सावधान किया कि जब हम कथा सुना रहे होंगे तो ओम का उच्चारण करके कथा श्रवण की पुष्टि करते रहना ताकि आपकी कहीं आंख ना लगे और हमें लगे कि आप कथा का माहात्म्य श्रवण कर रहीं हैं।
भगवान श्री सदाशिव ने कैलाश पर्वत पर स्थित पर्ण कुटीर से सभी जीव जंतु पक्षियों को भगा दिया। यह भली प्रकार सुनिश्चित किया कि कहीं कोई इस अमृत कथा का श्रवण ना करें। भगवान शिव की दृष्टि से एक शुक पक्षी तोता जो कि अंडज रूप से वहां कोने में पड़ा था। पहले दिन की कथा सुनने के बाद अंडज शुक अपने शुक रूप में आकर वृद्धि पाने लगा। माता पार्वती जी कथा श्रवण करते करते ओम उच्चारण का हुलारा दे रही थी। चौथे दिन माता पार्वती जी को नींद ने घेरा डाल लिया। शुकदेव जी ने सोचा अगर अब हुलारा ना दिया गया तो भगवान शिव जी अमृत कथा सुनाना बंद कर देंगे। ऐसे में माता पार्वती जी की जगह शुकदेव जी ने हुलारा देना शुरू कर दिया। सातवे दिन अमृतकथा की समाप्ति पर भगवान शंकर जी ने देवी पार्वती से कथा समाप्ति का प्रकरण/प्रसंग का वृतान्त सुनने की पुष्टि करनी चाही तो पता चला कि चौथे दिन की कथा के बाद देवी से पुष्टि की तो पता चला कि देवी पार्वती ने चार दिन की ही कथा सुनी है।
अब भगवान शंकर जी खोजबीन में लगे कि अगर देवी पार्वती को नींद आ गई तो उनकी जगह हुलारा देना वाला पर्ण कुटीर में कौन छुपकर कथा सुन रहा था? तभी शुकदेव पक्षी तोता पर उनकी दृष्टि पड़ी जो कि अमृत कथा सुन चुका था। भगवान शिव ने क्रोध में अपना त्रिशूल उसको मारने को संभाला तो तोता उड़ चला। भगवान शंकर उसके पीछे-पीछे चल दिए। शुकदेव महर्षि वेदव्यास के आश्रम में प्रविष्ट हुआ। वहां पर वेदव्यास जी की धर्मपत्नी उवासी ले रही थी। अमृतकथा का श्रवण करने वाले अजर अमर अविनाशी सुखदेव जी ने सुक्ष्म रुप धारण करते हुए उनके गर्भ में प्रवेश कर लिया। महर्षि वेदव्यास ने सब कारण और रहस्य जानकर शंकर जी का क्रोध शांत किया कि आप मेरी धर्मपत्नी के गर्भ से जन्म लेने वाले इस शुकदेव जी का तनिक बाल भी बांका नहीं कर पाओगे। यह तो इस सृष्टि के आदि मध्य अन्त तक चिरकाल तक अजर अमर बनकर आपकी अमरनाथ बर्फानी गुफा में विचरण करता रहेगा।