श्री मद्भागवत महापुराण कथा के चौथे दिवस नरसिंह भगवान जी ने दैत्य हिरन्यकश्यप का संहार किया।

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श्री मद्भागवत महापुराण कथा के चौथे दिवस नरसिंह भगवान जी ने दैत्य हिरन्यकश्यप का संहार किया।

देवभूमि न्यूज डेस्क
अंदोरा-गगरेट

जिला ऊना के प्रसिद्ध महातीर्थ श्री राम मंदिर अंदौरा-गगरेट सन्निकट सोमभद्रा-स्वां नदी बाजार में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के चौथे दिन आचार्य श्री गणेश दत्त शास्त्री जी ने श्रद्धा भक्ति का अलौकिक संचार किया। आज संस्कारानुगत योग का महत्व समझाते हुए व्यासपीठ पर आसीन आचार्य श्री ने कहा कि हमारा परिवेश शुद्ध होना चाहिए। उन्होंने ने आहार शुद्धि की महत्व भी बतलाया। जीवन में श्रद्धानुगत भक्ति भावना और सात्विक आहार से ही परमार्थ मार्ग पर आरूढ़ होने की शक्ति मिलती है। दैत्य हिरन्यकश्यप एक बार जंगल को शिकार करने गया। रास्ते में सबसे पहले एक महात्मा जी मिले जो कि श्री नारायण-नारायण का उद्घोष लगा रहे थे। हिरन्यकश्यप अपने प्रारब्ध को कोसने लगा कि आज कोई शिकार नहीं मिलने वाला है।
वह बहुत बार श्री नारायण- नारायण बोलने वाले महात्मा जी को याद करने लगा। ऐसे में भक्त वत्सल भगवान जी ने उसके मन-मस्तिष्क में एक पुन्य संस्कारानुगत योग का संचित पुण्य के फलस्वरूप भक्त प्रह्लाद की प्राप्ति सुनिश्चित कर दी थी। महात्मा के श्री नारायण- नारायण के सतत् चिंतन और प्रसंग में दैत्य हिरन्यकश्यप की पत्नी क्याधू ने गर्भ धारण किया।
यह जन्म-जन्मांतर का अद्भूत पुन्य संयोग था जिसने दैत्य हिरन्यकश्यप की परमगति का पुत्र प्रह्लाद व नरसिंह अवतारी भगवान श्री विष्णु हरि से उद्धार का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
अतः मनुष्य को सदैव पुन्य को जीवन में हर सम्भव संचित करना चाहिए। पुण्य अर्जित करने से ही गति मिलती है।
*राजीव शर्मन*