टारणा धारा! बड़ा नज़ारा!!
(कहानी)
-राजीव शर्मन् अम्बिकानगर-अम्ब कलौनी समीप रेलवे स्टेशन रोड अम्ब-ऊना हिमाचल प्रदेश।
देवभूमि न्यूज डेस्क
शहर की टारणा धार में सबसे पहले सूर्य नारायण सदियों से प्रकट होते आये हैं। प्राची से सबसे पहले किरणें टारणा धार को आलोकित करने के साथ-साथ मानवीय जीवन को संचारित करती आई है। टारणा धार पंद्रहवीं शताब्दी तक प्राचीन मांडव्य नगर जनपद का वीहड़ जंगल था। यहां पर मानवीय आबादी शून्य थी।
सेन वंशज राजा श्याम सेन ने भगवती श्यामा काली जी का (टारणा माता जी) निर्माण करवाया तो मंदिर को जाने वाली तीन सौ से ज्यादा पौड़ियों को चढ़ते-उतरते धार्मिक श्रद्धालुओं के साथ साथ अगल बगल में आबादी भी आबाद होने लगी थी। परिवर्तन के नये दौर में टारणा धार की उच्च शिखर तक सैंकड़ों मकानों का निर्माण सुनिश्चित होकर एक नया नगर अस्तित्व में आने लगा था। पौड़ियों के रास्ते के अतिरिक्त टारणा धार को टिल्ली कैहनवाल,तल्याहड़,श्री महामृत्युंजय भगवान थनेड़ा,श्री नीलकंठ महादेव जी,छोटी टारना माता जी के रास्ते भी निर्मित होने लगे थे।
कालांतर में तो श्री श्यामा काली माता जी टारणा धार सारे शहर के विहंगम दृश्य की चश्मदीद गवाह है। टारणा धार के शिखर से पहली दृष्टि हजारों सालों से बह रही ऐतिहासिक पौराणिक नदी व्यास दरिया पर पड़ती है जो कि नये -पुराने मांडव्य जनपद की धर्म संस्कृति की पोषक मानी जाती है।व्यास कुंड रोहतांग-मनाली-कुल्लू-हनोगी माताजी, पंडोह-बडाणूं में ऊहल दरिया को अपने में समाहित करती व्यास की धारा जब ऐतिहासिक श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के गुरूद्वारा साहिब के सन्निकट प्राचीन श्री मांडव्य ऋषि की तपोभूमि की मांडव्य शिला को स्पर्श करती है तो वहां नदी का वेग एकाएक उल्लासित हिलोरें लेता हुआ ढगानाली-बाड़ीगुमाणू तक एक अलौकिक परिदृश्य प्रस्तुत करता है जो कि टारणा माता धार से ही सर्वत्र दृष्टिगोचर होता आया है।
इसी टारणा धार के सड़क सम्पर्क मार्ग पर डूमराम की पुरानी झौंपड़ी हुआ करती थी। टारणा धार से पत्तों और बांसों को काट-काट कर वह अपने परिवार का भरण पोषण चलाता था। ज्यादातर पत्तलें-डोने,बांस की टोकरियां बनाकर वह सारे शहर में बेचा करता था। यह रियासत कालीन समय की बात है जब बरसात के दिनों में डूमराम को गणेश प्रतिमा विसर्जन पर शहनाई वादन करते हुए भी देखा जाता था।डूमराम पर राजा जोगिंदर सेन की कृपा दृष्टि हुई तो उसकी झौंपड़ी से सटी खाली बंजर भूमि को भी उसको जज व्यास देव की अदालत में राजा ने स्वयं सुनवाई करके उसको मालिकाना हक दिला दिया था। डूमराम का परिवार इससे राहत महसूस करने लगा था। डूमराम के बड़े लड़के कर्म चंद ने काफी मेहनत मुशक्कत करके बंजर दुम जमीन को उर्वरक अब्बल बारानी जमीन में तब्दील कर दिया था। इससे पास पड़ोस और डूमराम की शरीक बिरादरी में खलबली मचना स्वाभाविक प्रक्रिया बन गई थी। वह डूमराम को कर्म चंद के प्रति भड़काने में दशकों लगे रहे किंतु घर उजाड़ने की फेहरिस्त सिरे नहीं चढ़ पा रही थी।डूमराम वृद्धावस्था तक अपने घर परिवार में एकता कायम रखने में कामयाब रहा था। डूमराम के एकमात्र सुपुत्र कर्मचंद के चार बेटे हुए इनमें सूरज सबसे बड़ा था। सूरज जब मिडल स्कूल की पढ़ाई में पहुंचा तो पास पड़ोस की गलत संगति के हत्थे चढ़ गया और उल जलूल प्रक्रियाओं में सम्मिलित रहने लगा था। यही नहीं बुशैहरू के शराब ठेके पर पर भी सांयकाल से रात्रिकालीन देखा जाने लगा था। टिल्ली कैहनवाल के जगत सिंह पी ई टी जी ने पूरी ताकत उसको सत्तपथ पर लाने की भरसक कोशिश की थी। गोपाल सिंह ,एन डी एस आई जी का भी दिली लगाव सूरज को सुधारने में नाकामयाब रहा था। सूरज प्राईमरी से निकलने के बाद से ही बांसुरी गायन बड़ी ही धुरंधर कलाकारी की श्रेणी से करता था। शराब की लत ने सब चौपट कर दिया था। कर्म चंद तो इसी गम में चल बसा कि उसका बड़ा लड़का छोटी सी उम्र में ही पियक्कड़ बन गया था। सारे घर का वातावरण खराब हो चुका था। डूमराम की रियासत कालीन जमीन को भी निकटतम पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने अपने नाम लिखवा लिया था। एक कमरा सूरज के पास सुरक्षित था।वह भी शरीक बिरादरी के लोगों ने सस्ते में अपने नाम लिखवा दिया था।
सूरज का अत्याधिक शराब से मरना निश्चित तौर पर अवश्यंभावी था। विन्द्रावणीं-साऊली खड्ड के पास उसकी कीचड़ में सन्नी गली सड़ी लाश का अंतिम संस्कार करवाया गया था।
सूरज के छोटे-छोटे भाई सड़कों पर आ गये थे। कोई महाजन बाजार में करियाने की दुकान पर, कोई कसाई खाने में बकरे काटने,तीसरा बेलीराम हलवाई की दुकान पर काम करने लगा था।
महाजन बाजार में काम करने वाला गोपाल काफी समझदार था।
उसने सारे घटनाक्रम की तस्वीर खींची थी और जीवन में एक सही मुकाम पर पहुंचने की पूरी बिसात बिछाई थी। प्रकाश महाजन ने इसमें गोपाल का पूरा साथ दिया था। बचपन में गोपाल ने दादा डूमराम की शहनाई बड़ी बखूबी सुनी थी। वह जन्मजात संगीत प्रेमी था। उसकी हर साज पर जन्मजात पकड़ थी।
अपनी मेहनत के बलबूते गोपाल ने एक सफल मुकाम हासिल कर लिया था। वह अपनी धर्म पत्नी शारदा की बदौलत एवं बाग बगीचे वालों ससुराल की मुकम्मल कृपा से बहुत बड़ी सम्पत्ति को अर्जित करने में कामयाब हो गया था।
आज फुर्सत के क्षणों में वह टारना माता की धार से अपने दादाजी डूमराम और पिता जी के संघर्षशील जीवन के अतीत में खो जाता है। शहनाई की आवाज़ उसके कानों में गूंजने लगती है। प्राची से सूरज को निकलता देख उसे बड़े भाई सूरज की याद सताने लगती है। टारना शिखर से दूर दूर तक बहती व्यास धारा को देखते वह सूरज की आत्मिक शांति की प्रार्थना में खो जाता है।