(रविवारीय कहानी) *खबरची उजागर सिंह*

Share this post

(रविवारीय कहानी)
*खबरची उजागर सिंह*
देवभूमि न्यूज डेस्क

अपने मोहल्ले का सुनील बचपन में बड़ा ही मजाकिया और हंसोड़िया था। स्कूल जाती बार भी सबकी ख़बर लेता था। यही नहीं गली में नुक्कड़ पर मौसमी फल सब्जियों व अन्य सामान बेचने वाले से भाव ताव करने लगता था। छोटे दुकानदार उसकी वृथा दिमाग चाटने की आदत से परिचित होकर उससे कन्नी काट लेते थे। सुनील को स्कूल जाने वाले दोस्तों ने बहुत बार समझाया था कि वह अपने स्कूल का कामकाज और अपना बस्ता ही संभाल ले! यही काम उसके लिए काफी है!! सुनील का स्कूली बस्ता भी रंग बिरंगे कपड़ो से सिला होता था। कई मर्तबा तो कहीं से बस्ता फट जाता तो चमकीले गोटे की किनारी से सुसज्जित बना दिया जाता था। सहपाठी उसको घेर लेते थे। सहपाठियों को मालूम था कि सुनील का बापू दर्जी और विवाह सेहरे बनाने का काम करता था। बस रास्ते से स्कूल तक वयंग्य वाणों की जंग छिड़ जाती थी। यही नहीं पटवारी भागीरथ का लड़का मदन तो सुनील के कपड़ों पर भी घेरेबंदी करता कि यह तो मुफ्त का कपड़ा बचाकर सिलाई की गई है। तभी सुनील कुमार का संवाद बाजारियों को हैरत में डाल देता था। सुनील कुमार मदन के बापूजी का नाम लेकर तंज कसता जाता था। सारे शहर की गलत पैमाईश से अपना घर भर लिया है। तभी तो सारे लोग बोलते जाते हैं। “भागीरथ पटवारी,मेरा पेट बड़ा भारी! सारे शहर का माल खाया, नहीं मारता डकारी!!”
दोनों के बीच बचाव में समर्थन करने वालों की भी शामत आ जाती थी। राशन के डिपो के हेमंत के पिताजी धर्मावतार की संज्ञा से विभूषित हो जाते थे। राकेश बोलता था कि वह तोल- बोल से ठगी ठोरी कर लेते हैं। श्यामलाल भी पीछे हटने वाला नहीं था। उसका अंदाज ही हैरत में डाल देता था। देखो भाईयों इसका बापू तो सारी ट्रांसपोर्ट ही खा गया है। घर जाकर देखोगे तो तेल के खाली ड्रम मिल जायेंगे। बहुत बार स्थिति गंभीर हो जाती थी। कक्षा में अध्यापकों को बड़ी मेहनत करके विवाद सुलझाने पड़ते थे ‌। कक्षा में शांत रहने के बाद छुट्टी होते ही स्कूल गेट के बाहर दोवारा महाभारत की किलेबंदी शुरू हो जाती थी। खेल का मैदान हो या तैराकी का खड्ड दरिया का किनारा, छींटाकशी का अजीबो-गरीब दौर शुरू हो जाता था। ऐसा नहीं था कि इनमें पारस्परिक प्रेम नहीं था? एक दूसरे सहपाठी को छुट्टी के दिन भी घर से ढूंढ निकाल लिया जाता था। शहर के चप्पे-चप्पे से वाकिफ होना और स्वछंद विचरण करना इन सब सहपाठियों का धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र बन चुका था। सुनील कुमार का वाकपटुता संवाद लाजबाव करता रहता था। अध्यापक अध्यापिकाओं ने भी सुनील से सबकी गतिविधियों की जानकारी लेकर उनकी प्रोगेस रिपोर्ट बना डाली थी। बचपन में ही सुनील को खबरची बनने का सौभाग्य प्राप्त होने लगा था।
मोहल्ले में बहुत सारे टेलर मास्टर दर्जी होने से सुनील के बापूजी का धंधा मंदा होने लगा था। विवाह शादियों के लिए सेहरे बेचने का सीजन भी फीका रहने लगा था। इसका कारण सीधा साफ़ था। सेहरा बनाने वाले और बेचने वाले सरदार कारीगरों ने भी मुकाबला तेज कर दिया था। सुनील के बापूजी के हाथ खड़े होने लगे थे। सुनील के बापूजी ने सभी बड़े लड़कों को आगाह कर दिया था कि वह जल्दी जल्दी मैट्रिक पास करके अपने अपने पैरों पर खड़े होकर आजीविका कमाना शुरू कर दो‌ अन्यथा टेलरिंग के भरोसे रहकर अपना भविष्य बर्बाद ना किया जाए।‌ सुनील दोनों भाइयों में एक कंडक्टर भर्ती हो गया तो दूसरा आई०टी०आई० में मैकेनिक का डिप्लोमा करके लोकनिर्माण विभाग में मैकेनिक होकर कबाईल क्षेत्र किन्नौर नौकरी करने चला गया था। सुनील कुमार दुकान में बापूजी का सहयोग करता और स्कूल में भी पढ़ रहा था। सुनील कुमार के पिताजी की दुकान किराए पर थी। दुकान के मालिक शिमला में नौकरी करते थे। सेवा निवृत्त होने पर दुकान खाली करने का नोटिस सुनील के बापूजी के लिए समस्या बना हुआ था। बहुत सोच विचार करके कंडक्टर लड़के ने अपने साथ कांगड़ा में रहने की पेशकश कर दी थी। सुनील के बापूजी ने अंत में फैसला लिया कि किन्नौर का कबाईली क्षेत्र में मैकेनिक लड़के के साथ रहना ठीक रहेगा। दुकान के पीछे ही रिहाईश भी थी। वहां का सामान भी इकट्ठा कर लिया गया था। सुनील कुमार ने बापूजी के निर्देश पर कबाड़ का सामान बेच दिया था। बोरी विस्तर समेट कर एक बोरी में वर्तन और कपड़ा सिलाई की मशीन पैक करके सुनील के पिताजी ने दुकान के मालिक को दुकान खाली करके चाबियां सपुर्द कर दी थी। सुनील कुमार ने बापूजी को आश्वासन दिया था कि वह मैट्रिक परीक्षा के पेपर कहीं से भी प्राईवेट देकर पास कर लेने की हामी भर दी थी। इस तरह से दोनों पिता पुत्र किन्नौर के लिए रवाना हो गए थे। गर्मियों के दिनों मौसम बहुत खुशगवार बना हुआ था। आवागमन पुरजोरों पर चल रहा था। दो महीनों बाद बरसात पड़ने पर रास्तों का कटाव शुरू हो जाता था। ऐसे में सारा सामान पहले से ही एकत्रित कर लिया जाता था। सुनील के बापूजी गोपाल का अधिकांश जीवन‌ कांगड़ा व हमीरपुर में व्यतीत हुआ था। कांगड़ा में ननिहाल था। बचपन में माताजी के साथ अक्सर ननिहाल आना जाना रहता था। कपड़ों की सिलाई का संस्कार नानाजी से ही ग्रहण किया गया था। वह सभी प्रकार के कपड़ों की सिलाई किया करते थे। गोपाल का पुश्तैनी गांव संधोल था। यहां पर काफी जमीन थी। किंतु सीमित संसाधनों का अकाल‌ रहने से पलायन‌ निश्चित था। इसलिए विवाह के बाद गोपाल ने पलायन‌ करके जाहू,रिवालसर, सुंदरनगर, जोगिंद्रनगर और मंडी में काफी पापड़ बेलने की भरसक कोशिश की थी। गोपाल की धर्मपत्नी बीमार रहने लगी थी। सुनील कुमार का जन्म होते ही वह चल बसी थी। गोपाल ने काफी मेहनत करके अपने बलबूते परिवार का भरण-पोषण करने हेतु दिन रात एक कर दिया था।
किन्नौर में मैकेनिक अशोक गद्दी गुज्जर शेषराम के मकान में रहता था। बहुत सर्दियों से पहले ही शेषराम भेड़ बकरियों सहित मैदानी इलाकों में निकल जाता था। ऐसे में एक पंथ दो काज भी हो जाते थे। घर पर लगाई गई बुनाई की खड्डी हथकरघा उद्योग का सामान ऊनी पश्मीना शॉलों का विक्रय भी मुनासिब और मुनाफे का सौदा बन जाता था। यही नहीं वापसी पर कुल्लू मनाली से घोड़ों-खच्चरों की खरीद फरोख्त भी सम्भव हो जाती थी। जब गोपाल ने अपने मैकैनिक लड़के अशोक के पास छोटे लड़के सुनील सहित दस्तक दी तो शेषराम गद्दी गुज्जर अपने घर पर ही था। मैकेनिक अशोक ने बापूजी गोपाल व शेषराम गद्दी जी की पहली मुलाकात करवाई थी। पहले सम्पर्क में ही शेषराम व गोपाल में पारस्परिक इत्तफाक बन गया था। शेषराम इस हुनर के आदमी से मिलकर बेहद खुश था कि गोपाल दर्जी का सारा काम जानता है। शेषराम ने गोपाल को पूर्ण विश्वास दिलवाया था कि उसके यहां रहने से किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होगी। सुनील कुमार यहां पहुंच कर बेहद खुश था। कुछ ही महीनों में गोपाल व शेषराम बहुत लंगोटिया यार बन चुके थे। शेषराम का कारोबार संभालने के साथ साथ पारिवारिक संबंध ही नहीं बल्कि बड़े लड़के अशोक मैकेनिक की शादी भी शेषराम की लड़की से होकर एक नया रिश्ता भी कायम हो गया था। सुनील किन्नौर की बागवानी पहाड़ियों पर घूमने का पूरा आनन्द लेने लगा था। वह शेषराम की छोटी लड़की लाजों के साथ बहुत संवाद स्थापित करता था। वह भी दसवीं कक्षा के पेपर देने वाली थी। सुनील ने भी किन्नौर का ही प्राईवेट परीक्षार्थी के तौर पर दाखिला भरा हुआ था। दोनों में पढ़ाई-लिखाई के मामले में एक सहकारिता का संवन्ध जुड़ा हुआ था। लाजों ने कबाईली क्षेत्रों की विभिन्न समस्याओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करके सुनील के मन मस्तिष्क में एक विचित्रता की रुचि पैदा कर दी थी। कबाईली क्षेत्रों का कायाकल्प करवाने हेतु विभिन्न दूरगामी योजनाओं का खाका खींचा जाने लगा था। गर्मियों के दिनों में दसवीं परीक्षा का दोनों का परिणाम पास घोषित होने से सभी बेहद प्रसन्न चित्त थे।लाजों और सुनील की पारस्परिक मित्रता गहराने लगी थी। उनका कबाईली क्षेत्रों को विकासोन्मुखी योजनाओं से जोड़ने का चिंतन मंथन भी चलने लगा था। वह अक्सर घोड़ों को लेकर दूर दराज तक घूमने निकल पड़ते थे। वह पहाड़ियों से सतलुज नदी के अथाह वेग को देखते रह जाते थे। दोनों का मानना था कि सतलुज नदी ने इस समूची कबाईलियों की घाटी को सरसव्ज बनाया है। दोनों ने कबाईल क्षेत्र की समस्यायों पर गहन विचारात्मक लेखन प्रारंभ कर दिया था। वह खेत खलिहानों में घूमते हुए वहां से कल-कल व रौद्र रूप से बहती सतलुज नदी के वेग का नजारा घंटों देखा करते थे। अपनी बाल्यावस्था की पुरानी अन्वेषण प्रवृत्ति के चलते सुनील अपनी मित्र लाजों से कहता कि वह सतलुज के साथ साथ एक ऐसी रेलवे लाईन बिछाने का एक बड़ा जबरदस्त लेख तैयार करेगा जिससे सामरिक महत्व से चीन की भी बोलती बंद हो जायेगी। इस पर लाजों खूब अट्हास करती थी कि ” मूर्ख! यह सतलुज नदी चीन की तरफ से ही आकर यहां कबाईल क्षेत्रों में प्रवेश करती हैं। चीन ने इसके जलस्तर पर नियंत्रण किया हुआ है। तेरी रेलवे लाईन को तो वह पानी छोड़ कर सतलुज में डूबो देगा। इस पर दोनों में नोंक-झोंक शुरू हो जाती थी। “सुनील लाजों को कहता कि तू चीन की तरफदारी करती है,तेरी शक्ल भी चीनी की तरह है”। दोनों में झगड़ा शुरू हो जाता था। बड़ी मुश्किल से सन्मति बन पाती थी। आखिर में लाजों ने समझौतावादी दृष्टि कोण अपनाते हुए सलाह दी थी कि नाथप्पा झाकड़ी की तर्ज़ पर बड़े और बांध बनाकर सतलुज के पानी को सुरंगी नहर से विपरीत दिशाओं से रामपुर- शिमला से कहीं सर्व सुलभ मैदानी इलाकों में ले जाने का भागीरथी प्रयास ही इसका एकमात्र सर्व सम्मति का हल खोजा जाना चाहिए था।”
लाजों ने कबाईली क्षेत्रों के लिए ऊंची ब्राड गेज रेलवे लाईन बिछाने से ही कबाईलियों का कायाकल्प सम्भावनायें तलाशी जानी चाहिए। इस प्रकार के सुनील कुमार के योजनाबद्ध लेखों की बहुत बार कमियां गिनाकर लाजों उसकी हालत पतली कर देती थी। लाजों ने कबाईली क्षेत्रों में सुनील कुमार की इस लेख योजना फेहरिस्त को खबरची उजागर सिंह का नाम दे दिया था। लाजों कभी कभी सुनील का डटकर मजाक मज़ाक में उसके मन मस्तिष्क को सही दिशा में झिंझोड़ देती थी। निकटवर्ती गांवों के कबाईलियों में भी एक ब्राड गेज रेलवे लाईन बिछाने का कौतूहल पैदा करने से सुनील कुमार उर्फ खबरची उजागर सिंह कामयाब हो गया था।
सुनील के बापूजी ने शेषराम का अपने कामकाज की कार्यकुशलता से दिल जीत लिया था। ऐसे में लाजों और सुनील ने भी अपनी सहकारिता की मित्रता की मिसाल कायम करने में सफलता हासिल कर ली थी।
दोनों के पारस्परिक सहयोग से समूचे कबाईली क्षेत्रों में बहुआयामी कायाकल्प की योजनाओं का लेखन प्रासांगिकता लिए हुए था। इससे बहुत सारे गांवों के कबाईलियों ने खबरची उजागर सिंह का अनुसरण और समर्थन शुरू कर दिया था। खबरनवीसों और विभिन्न टैलीविजन चैनलों के लिए भी सुनील कुमार उर्फ खबरची उजागर सिंह ने कबाईली क्षेत्रों के लिए ब्राड गेज रेलवे लाईन और सतलुज नदी में नाथप्पा झाकड़ी की तर्ज़ पर एक और बांध बनवाने को लेखनीबद्ध कर सभी सम्भावनाओं को तलाशने का भारत सरकार से पुरजोर आग्रह किया था।
जब लेह-लद्दाख रेलवे लाईन का सर्वेक्षण शुरू होने वाला था। उन दिनों लाजों और सुनील ने किन्नौर घाटी के बड़सेरी समीप नदी पर बांध बनवाने और यहां से किन्नौर ब्राड गेज रेलवे लाईन स्टेशन बनवाने की जोरदार मांग बारे लेखनीबद्ध कर दी थी।
वर्तमान में लाजों और सुनील का विवाह हो चुका है। दोनों राजधानी शिमला में रहते हैं। वह दोनों विभिन्न समाचार पत्रों व दूरदर्शन से जुड़े हुए हैं। दोनों आज भी कबाईली क्षेत्रों के लिए ब्राड गेज रेलवे लाईन बिछाने के लिए सार्थक लेखन में भी जुटे हुए हैं। दोनों को पूर्ण विश्वास है कि किन्नौर में अतिरिक्त बांध बनवाने और सतलुज का पानी सुरंगी नहर से मैदानी इलाकों में ले जाने से चीन का कोई भी नियंत्रण सतलुज नदी पर नहीं रहेगा। इसी तरह कबाईली क्षेत्रों में ब्राड गेज रेलवे लाईन समूची घाटी का कायाकल्प करवाने में सफल सिद्ध होने बारे प्रारुप तैयार होने लगा है।
– राजीव शर्मन
सोमभद्रा-स्वां नदी बाजार,समीप
अम्बिकानगर-अम्ब,कालोनी
रेलवे स्टेशन रोड अम्ब (हि. प्र.)