शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवनी को किया जाए पाठ्यक्रम में शामिल-हेमराज राणा

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शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवनी को किया जाए पाठ्यक्रम में शामिल-हेमराज राणा

देवभूमि न्यूज डेस्क
शिलाई

आज हम उस वीर योद्धा ओर परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा जी के जीवनी के बारे में चर्चा करेंगे जिन्होंने 7 जुलाई 1999 को भारत मां के खातिर शहादत पाईं थीं और उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया था वह ऐसे पहले सैन्य अधिकारी थे जिन्होंने कारगिल युद्ध में सबसे पहले अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था जिनका जन्म 9 सितंबर 1974 को कांगड़ा जिला के पालमपुर में हुआ था और उनकी पढ़ाई डीएवी स्कूल पालमपुर ओर डीएवी कॉलेज चण्डीगढ़ ओर पंजाब यूनिवर्सिटी से MSc की पढ़ाई कर रहे थे

और आएमए में कमिशन प्राप्त करने के उपरांत भारतीय सेना में शामिल हुए थे और कारगिल युद्ध में शहीद हो गए थे जिनके शब्द थे (ये दिल मांगे मोर)जिनको आज शहीद हुए 23 वर्ष हों चुके हैं जिनके पिताजी श्री गिरधारी लाल बत्रा जी जो शिक्षक है ओर माता जी कमल कान्त बत्रा जी ग्रहणी है और भाई का नाम विशाल बत्रा है और दो बहनें हैं, कैप्टन विक्रम बत्रा जी एक जिन्दा दिली ओर वीर सेनिक थे जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बगैर ही दुश्मनों के छक्के छुड़ाते रहें और दुश्मनों के 19 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिए थे आज हम आपको उनके पिताजी के 22 वर्ष पूर्व की बात करते हैं जब शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा जी के पिताजी श्री गिरधारी लाल बत्रा जी ने रक्षा मंत्रालय को एक निवेदन पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने निवेदन किया था कि मुझे उस जगह पर जाने की आज्ञा दी जाएं जहां पर मेरा बेटा वीरगति को प्राप्त हुआ ताकि मैं वहां के परिदृश्य को देख सकूं और महसूस भी कर पाऊ ओर उन्होंने साथ साथ यह भी दर्शाया था कि अगर मेरे आवेदन के विषय पर राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा है तो वह आवेदन वापस भी ले सकते हैं तो जब उनके आवेदन को सम्बन्धित अधिकारी ने देखा तो उन्होंने मन में सोचा कि इनके आवेदन पर सरकार ओर रक्षा मंत्रालय का काफी खर्च आएगा , परन्तु उन्होंने मन बनाया की अगर रक्षा मंत्रालय उनके आवेदन को स्वीकार भी नहीं करतीं हैं तो वह अपने निजी खर्च से शहीद कैप्टन विक्रम जी के पिताजी ओर माताजी को उस स्थान पर जरूर लें जाएंगे जहां पर उस वीर योद्धा ने भारत मां के खातिर शहादत पाईं थीं तो जब श्री गिरधारी लाल बत्रा जी ओर माताजी कमल कान्त बत्रा जी उस स्थान पर पहुंचते हैं तो वहां सभी सैनिकों और अधिकारियों द्वारा भव्य स्वागत किया जाता है और उसी सैन्य अधिकारी ने कैप्टन विक्रम बत्रा जी के पिताजी गिरधारी लाल बत्रा जी को पुष्पों की माला पहनाकर उनके चरण स्पर्श किए तो कैप्टन विक्रम बत्रा जी के पिताजी ने कहा कि आप मेरे पांव क्यों छू रहें आप तो एक उच्च अधिकारी रहें हैं तो उस अधिकारी का जबाव आया कि सर मैं बड़ा सौभाग्यशाली हूं की मुझे आपके पांव छूने और पुष्प अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है क्योंकि मैं उस दौरान मौजूद था जब आपके वीर पुत्र कैप्टन विक्रम बत्रा ने कारगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ा रहे थे और उस समय में लड़ाई के लिए तत्पर था और तभी विक्रम बत्रा ने कहा कि आप तो विवाहित हो ओर बच्चे भी हैं मैं अभी अविवाहित सबसे पहले मैं लड़ाई में जाऊंगा और उन्होंने मुझे जाने से रोक दिया और दुश्मनों के छक्के छुड़ा रहे थे और उन्होंने दुश्मनों के 19 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था परन्तु जब हमने उस चोटी पर भतहे हासिल कर लिया था तो एक चट्टान के पीछे छुपे पाकिस्तानी सैनिकों के द्वारा कैप्टन विक्रम बत्रा पर हमला किया गया ओर उनको 42 गौलिया लगी थी ओर उन्होंने अन्तिम सांस मेरे गोद में ली और उनके अंतिम शब्द जय हिन्द थे तो उस समय के मेरे उच्च अधिकारी ने मुझे आपके घर पालमपुर जाने की आज्ञा नहीं दी और मैं आपके बेटे को फूल नहीं अर्पित कर पाया परन्तु आज खुशकिस्मत हूं कि सर आपको पुष्प अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है तो उस समय कैप्टन विक्रम बत्रा जी की माता श्रीमती कमल कान्त बत्रा जी हल्के हल्के आंसूओं से रो रही थी परन्तु श्री गिरधारी लाल बत्रा जी ने बिल्कुल भी आंसू नहीं निकालें और वह क्या क्षण रहें होंगे जब माता पिता के लिए क्या दृश्य रहा होंगा जिसको हम सभी के लिए सोचना ओर परिकल्पना करना भी मुमकिन नहीं है और हम नमन करते हैं उन माता-पिता को जिन्होंने ऐसे वीर योद्धा को जन्म दिया ओर जिस वहादुर सैनिक ने भारत मां के खातिर शहादत पाईं आज हम सभी का भी कर्तव्य है कि हम कैप्टन विक्रम बत्रा जी के जीवनी ओर बलिदान को घर घर तक पहुंचाएं ओर अपने आने वाले बच्चो यह सन्देश ओर उनके बलिदान के बारे में अवश्य अवगत करवाएं ताकि उनके बलिदान को हम सभी सदा याद करते रहे और उनके परिजनों के दुःख दर्द को बांटने का एक छोटा सा प्रयास किया जाए, आज कैप्टन विक्रम बत्रा जी के जीवनी ओर बलिदान को स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की भी परम आवश्यकता है तथा सरकार से भी निवेदन रहेगा की ऐसे वीर सैनिक के जीवनी को पाठ्यक्रम में भी शामिल करे, ताकि आने वाली पीढ़ी उनके जीवन से प्रेरणा ले और उनके पदचिन्हों पर चलकर भारत का नाम रोशन करते रहे जिन्होंने छोटी सी उम्र में ही सर्वोत्तम बलिदान देकर अपना नाम सुनहरे अक्षरों में अंकित कर दिया क्योंकि आज स्क्रीन के हीरो तो याद रहते हैं परन्तु हमारे असल जिंदगी के हीरो हम धीरे धीरे भूल जाते हैं आज हम सभी का दायित्व बनता है कि हम ऐसे वीर योद्धा को कभी ना भूलें और सदा अपने आदर्शों में बनाएं रखें…! ✍️ ठाकुर हेमराज राणा