वाह! नया घराट-चला। (कहानी) -राजीव शर्मन् अम्बिकानगर-अम्ब कलौनी रेलवे स्टेशन रोड अम्ब-ऊना हिमाचल प्रदेश।

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वाह! नया घराट-चला।

(कहानी)
-राजीव शर्मन् अम्बिकानगर-अम्ब कलौनी रेलवे स्टेशन रोड अम्ब-ऊना हिमाचल प्रदेश।

देवभूमि न्यूज़ डेस्क
महाभारत युद्ध की ऐतिहासिक लड़ाई तो अठारह दिन तक सबको पतन के कगार पर ले गई थी। इस युद्ध समाप्ति को पांच हजार सालों से भी ज्यादा समय व्यतीत हो चुका है। द्वापर युग की समाप्ति और घोर कलिकाल में तो जगह जगह मानवीय समस्याओं का युद्ध व नित्यप्रति का अखाड़ा बना हुआ है। जगह जगह संस्कारी पुरोहित अपने अपने यजमानों को कल्याणकारी परामर्श देकर इस घोर कलिकाल से निजात दिलाते रहे हैं। इनमें पंडित मतिधर जी का नाम भी अग्रिम पंक्ति में सम्मिलित है।
सुकेत रियासत में पंडित मतिधर बहुत बड़े विद्वान पुरोहितों की श्रेणी में होने के साथ-साथ बहुत बड़े देवी उपासक भी थे। पीड़ित मानवता कल्याणार्थ उनका संवाद बहुत प्रासांगिकता लिए हुए होता था। जब कभी किसी पेचीदगियों में उलझे मानवीय जीवन का कायाकल्प करवाने की ठान लेते तो सचमुच चमत्कृत कर देते थे।
हर समय उनके पास लोगों का अपनी अपनी समस्याओं को लेकर तांता लगा रहता था।

वह त्रिकालज्ञ ज्योतिषी माने जाते थे। सुखदेव वाटिका के सानिध्य में उन्होंने बनारस काशी विद्यापीठ से लौट कर अपनी सतत् साधना जारी रखी थी। वह घंटों ध्यान साधना रत भी रहते थे।
स्थानीय पंडित हरिराम की बेटी सौभाग्यवती जड़ोली से आम का एक टोकरा लेकर उनकी बैठक में शरणागत हुई थी। सौभाग्य वती की घरेलू समस्याओं का पहाड़ खड़ा हो गया था। पहले पहल मायके में रिश्तेदारों ने पैतृक सम्पत्ति की बंदरबांट ने बहुत बुरी तरह छकाया था। मतिधर ने सौभाग्य वती को पुरानी अदालती कार्यवाही का इतिहास याद दिलाया था। पहले पहल वास्तव में पुरोहितों को अपने यजमानों की सातों पीढ़ियों का रिकॉर्ड दर्ज रहा करता था। बड़े बड़े पुराने मोटे पीले कागज के रजिस्टर हरिद्वार के पुरोहितों की तरह सुरक्षित रहा करते थे। अखरोट-बादाम के छिलकों को जलाकर गाय का गोंतर और काला रंग डालकर पक्की काली स्याही तैयार करके लिखावट की जाती थी जो कि सैंकड़ों सालों तक सुरक्षित रहती थी। पंडित मतिधर जी ने सौभाग्य वती को याद दिलाया कि कोई समय उसके मैहल मोरी के गंगू ताऊजी को भी उन्होंने लड़ाई की जगह छोड़ देने का परामर्श दिया था। अलबत्ता उन्होंने ध्यान नहीं दिया और उलझते चले गए। हिस्सेदारों ने बहुत बुरी तरह से घेराबंदी कर डाली थी। हमीरपुर से सरकाघाट तक कहीं भी उनका ठहराव अथवा टिकाव नहीं हो पाया था।

मतिधर जी ने परत दर परत सारी वस्तु स्थिति में सौभाग्य वती को अवगत करवाना जारी रखा था। इतने में त्रयाम्बली धार से लकड़ी का गट्ठर लेकर सदानंद ब्राह्मण भी उपस्थित हुआ। पंडित मतिधर ने अपनी धर्मपत्नी को पानी पिलाने का आदेश दिया था। सदानंद भी जुल्मों सितम का शिकार था। उसकी सारी जमा पूंजी व सम्पत्ति कोरी ठगी रिश्तेदारों ने छीन ली थी। दो कुंवारी बेटियों को विवाह से महरूम होना पड़ा था। बहुत जल्दी ही वह दोनों काल ग्रास में समा गई थी। मतिधर ने सौभाग्य वती को चेताया था कि बड़ी लम्बी चौड़ी दुनिया बसा करती है। भगवान ने सबको सरसव्ज बनवाया है। आत्म रक्षा के लिए कलहकारी भूमि का त्याग सर्वोपरि रहता है। मतिधर अच्छी तरह जानते थे कि सौभाग्य वती का मायका और ससुराल दोनों सम्पत्ति की लड़ाई का महाभारत बन चुका है। मायके की हटली-बलद्वाड़ा सरकाघाट की जगह भी हिस्सेदारों ने जबरन कब्जा करके लूट ली थी। यही नहीं जब सौभाग्य वती के पति ने इजराय करके दावा ठोका तो बीस बुद्धि वाले शत्रुओं ने ना जाने कहां कहां से कुनवा जोड़ते हुए सौभाग्य वती के ससुराल में भी अपनी बेवा बहनों की सम्पत्ति तलाश करते हुए दावा ही नहीं ठोका अपितु राजस्व कागज़ी इंद्राज में दर्ज़ बहनों के नाम का लाभ उठाते हुए सौभाग्य वती के ससुराल के मकान की भी रजिस्ट्री अन्यत्र पड़ोसियों से पैसा वसूल करके एक नई चक्र बाजी को जन्म दे दिया था।
पंडित मतिधर ने सौभाग्य वती को सलाह दी थी कि अब भी समय है जब इस तिलिस्म के संकट से निजात ढूंढ ली जानी चाहिए। सौभाग्य वती गहन चिंतन में चली गई थी। उसको एहसास हो गया था कि हटली-बलद्वाड़ा सरकाघाट की जगह की आड़ ही में तो वैरियों ने उसके ससुराल की भूमि एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हड़पने का जाल बिछाने की पूरी कवायद की है।
पंडित मतिधर ने एक बार पुनः याद दिलाया कि रिश्तेदारों द्वारा त्रस्त होने पर उन्होंने स्वयं परसराम हलवाई को‌ बोलकर तुम्हारे पिताजी को अलग से भूमि दान दिलवाई थी। एक बात पुनः याद रखना कि इस भूमि पर बना मकान भी बहुत पुराना हो चुका है और भविष्य में इस पर भी तेरी बहनों द्वारा अतिक्रमण अवश्य किया जायेगा तथापि महाभारत का एक और घरेलू युद्ध तैयार होने वाला है। इस पर सौभाग्य वती बहुत ही चिंतित हो गई थी।
उसने एक बार पुनः पंडित मतिधर जी से इस आने वाले संकट से निजात दिलाने का पुरजोर अनुरोध किया था। मतिधर जी ने एक अच्छी सलाह के अन्तर्गत सुझाया था कि सौभाग्य वती तेरे पतिदेव सरकारी नौकरी करते हैं। अपना सारा ध्यान कहीं अन्यत्र किराये के मकान में रहकर अपने तीनों बेटों का पढ़ाई-लिखाई से भविष्य संवारने का भरपूर प्रयत्न करो। बाकी तो सब संसारिक छलावा है। इसी तरह पंडित मतिधर जी ने उसकी बड़ी बहन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उसनेे भी अपनी बुद्धि भ्रम के कारण अपना परिवार तबाही के कगार पर खड़ा कर दिया है। एक बेटी कल्पना तो कुंवारी ही मां बन गई थी। बड़ी मुश्किल से उसको आबाद किया जा सका था। इस गम में डूबे पिता जी की भी मौत हो गई थी। मतिधर जी ने खुलासा किया कि यह त्रिगुणात्मक प्रकृति की माया है सभी जगह छल प्रपंच कपट पाप हावी हो चुका है। इस संसार सागर से तैरना एक बहुत बड़ी महाचुनौती है।
अब यह सारा निर्णय सौभाग्य वती को ही करना था।
सौभाग्य वती ने घर जाकर पतिदेव श्रीधरन से परामर्श कर एक नई दिशा दशा तय कर ली थी।
जल्दी ही श्रीधरन ने अपना तबादला पहाड़ी क्षेत्र में करवा लिया था। शुरुआत में तो किरायेदार बनकर बहुत सालों तक डटे रहे थे। इस नये पहाड़ी क्षेत्र में एक लाला संतराम की बदौलत कुछ जमीन और एक छोटा सा बना बनाया मकान खरीदने में सफल हो गए थे।
श्रीधरन और सौभाग्य वती ने सारा ध्यान अपने तीनों बेटों का भविष्य उज्जवल बनवाने में लगा दिया है।
समय बड़ी तीव्र गति से इस पहाड़ी ग्रामीण परिवेश में व्यतीत होता चला गया था।
यह नया शांति निकेतन पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्र श्रीधरन और सौभाग्य वती के लिए वरदान साबित हुआ। तीनों लड़कों ने अपनी सरकारी उच्च पदवियों पर तैनाती हासिल कर ली है। सोने पर सुहागे वाली बात यह है कि तीनों की धर्मपत्नियों ने भी सरकारी नौकरियों पर सफलतापूर्वक मुकाम हासिल किया है।
नाकारात्मक और दकियानूसी रिश्तेदारों ने श्रीधरन और सौभाग्य वती के ठिकानों को तलाश कर मुकदमे बाजी का दौर शुरू करवाने हेतु अदालती समन भेजने का सिलसिला काफी सालों तक जारी रखा था। एक कहावत है कि ना तो बैरी चैन से खुद जीतें हैं और ना ही जीने देते हैं।
अंतोगत्वा श्रीधरन अदालत में समन आने पर हाजिर हुए और जब जज के सामने सिरी तिलस्मी पोल खोल कर व्यानात दिए तो सभी ठगे से रह गये। हालांकि जज साहब ने श्रीधरन को कहा कि यह करोड़ों रुपए की सम्पत्ति है। आप इससे एकदम किनारा कसी कर निकलना चाहते हैं?
श्रीधरन ने जज को दोनों हाथ जोड़कर कर खुलासा किया कि सब दुनियावी माया है। इस सम्पत्ति का वह पिछले पचास सालों से कोई भी साकारात्मक उपयोग नहीं कर पाये है। जज साहब ने चेताया कि आपको एक्स पार्टी करके किनारे कर दिया जायेगा। श्रीधरन ने पुनः दोनों हाथ जोड़कर हामी भर ली थी।
श्रीधरन और सौभाग्य वती जीवन यापन करते हुए धर्म कर्म में लीन रहने लगे थे।
उधर रिश्तेदारों में पिछले पचास सालों का पारस्परिक सम्पत्ति का घमासान युद्ध अदालत से बाहर निकल कर फौजदारी में तब्दील हो चुका था। ऐसे में बहुत सारे हिस्सेदारों की मौत भी हो चुकी थी।
कुछ रिश्तेदारों/हिस्सेदारों का तो कोई बेली वारिस भी नहीं बच पाया है। कुछ मकान खंडेरात बन चुके हैं। कुछ बैंक कर्ज के पैसे की अदायगी ना होने पर नीलाम हो गये हैं।
श्रीधरन और सौभाग्य वती के तीनों बेटों को अच्छा सदैव जीवन पथ पर आगे बढ़ने का सुसंस्कार मिला है। तीनों भाइयों में गहरा प्रेम सद्भाव बना हुआ है। सबसे छोटे लड़के ने बैंक के नीलाम हुये पुश्तैनी मकान को छुड़ा लिया है।

सभी भाईयों ने अपने अपने पुश्तैनी और ननिहाल के मकानों का कायाकल्प करवा दिया है। इन नये मकानों में स्कूल, मैरिज पैलेस इत्यादि खुल चुके हैं।
श्रीधरन और सौभाग्य वती आजकल चार धाम की यात्रा परिपूर्ण कर रहे हैं। पुराने नफरत के तिलस्मी घराट तो हांफ चुके हैं। त्रिगुणमयी माया का संसारिक मोह-माया का पासा कब अपनी गिरफ्त में लेकर उल्टा घूमने लगे?
यह समदर्शिता की सोच पैदा करते हुए श्रीधरन‌ और सौभाग्य वती ने वानप्रस्थाश्रम की शरण ले ली है। इस छल प्रपंच कपट की दुनिया का घराट तो सबको पीसता चला आ रहा है। उन्होंने अपने तीनों बेटों, तीनों बहुओं और सभी पोते पोतियों के प्रति निर्मोही भावनाओं को बलवती बनाकर पूर्णतः त्याग कर दिया है।
अब तो नई समरसता को सरसव्ज करने वाला नया घराट अनवरत चल रहा है