महिला वैज्ञानिक टीम लाहौल-स्पीति घाटी में वन्य प्राणियों पर कर रही सर्वे
देवभूमि न्यूज डेस्क
यशपाल कपूर
सोलन
पूरे देशभर में बेटियों के सशक्तिकरण पर विमर्श और कार्य आज सबसे ऊपर हैं। दुनिया की आधी आबादी यदि सशक्त होंगी तो अवश्य यह धरती स्वर्गानुभूति करवाएगी। बेटियों की समृद्धि हमारी समृद्धि है। दुनिया में नारी के अनेक अवतार हैं। वो अनेकों रूपों में उत्तरदायित्वों का निर्वहन करती हैं। कठिनतम से कठिनतम कार्यों को सफल अंजाम देती हैं। नारी की शक्ति कल्पनातीत है। जहां नारी का सम्मान है वहां सम्मान भी गौरवान्वित हो उठता है

और उसकी महक वातावरण में सकारात्मकता लाती है। यद्यपि राह में कुछ दकियानूस विचार रोड़ा डालते हैं पर पहाड़ी नदी को बड़े-बड़े शिलाखंड क्या कभी रोक पाए हैं वो खड़े-खड़े वहीं रह जाता है और नदी अपना रास्ता बना लेती है। ये नदी है नारी। नदी-नारी और संस्कृति ये हमारी त्रयी हैं। इसी को साबित करने में जुटी हैं जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की महिला वैज्ञानिक टीम। यह टीम हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र लाहौल घाटी में वन्य प्राणियों पर 15 दिन सर्वे कर रही है। देश में यह अपनी तरह तरह का यह पहला वन्य प्राणी सर्वे हैं, जिसमें सभी वैज्ञानिक महिलाएं हैं और पूरे देश से यहां आई है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की पहली महिला निदेशक डॉ धृति बेनर्जी के नेतृत्व में यह 15 दिवसीय सर्वे किया जा रहा है।

जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के हाई अल्टीट्यूट सोलन स्टेशन की प्रभारी अधिकारी डॉ अवतार कौर सिद्धू ने बताया कि लाहौल और स्पीति के लिए पहला महिला वैज्ञानिक जीव अभियान रिमोट हाई एल्टीट्यूड हिमालयन इकोसिस्टम, जूलॉजिकल सर्वे किया जा रहा है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया हमारे देश का एक प्रतिष्ठित संस्थान है, जिसकी स्थापना जुलाई 1916 में हुई थी और इस महीने ने अपने 107 साल पूरे कर लिए हैं। डॉ धृति बनर्जी 2021 में जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की पहली महिला निदेशक के रूप में शामिल हुईं। उनके नेतृत्व में, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की महिला वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने के लिए पहली महिला वैज्ञानिक लाहौल घाटी, जिला लाहौल और स्पीति (हिमाचल प्रदेश) के लिए जीव-जंतु अभियान: सुदूर उच्च ऊंचाई वाले हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का आयोजन 15 दिनों के लिए किया जा रहा है। लाहौल घाटी उबड़-खाबड़ जलवायु परिस्थितियों के साथ हिमालय के उच्च ऊंचाई का एक दूरस्थ इलाका है, जहां महिला टीम 2800 मीटर से 5800 मीटर की ऊंचाई तक लुप्तप्राय और स्थानिक जीवों की विविधता का पता लगाएगी। इसमें दूर-दराज की घाटियां (मियार घाटी, उदीपुर और घेपन घाटी, सिसु), दर्रे (बारालाचा दर्रा और शिंकुला दर्रा), सूरज ताल की ताजे पानी की झील और सरचू, चचत्रु, छोटा दारा और बटाल के ट्रांस हिमालयन ट्रैक्ट शामिल होंगे। ये उच्च ऊंचाई वाले कठिन मार्ग हैं जहां पुरुष भी जाने से बचते हैं। इस अभियान में शामिल महिला वैज्ञानिक हैं।

डॉ धृति बनर्जी, निदेशक और वैज्ञानिक-जी, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ग्रुप डिप्टेरा में मक्खियों सहित काम करना), डॉ देबाश्री डैम, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, कोलकाता, (जीवाश्म और हेमिप्टेरा), डॉ. अवतार कौर सिद्धू, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, सोलन (स्तनधारियों और तितलियों पर काम कर रहे हैं), डॉ इंदु शर्मा, जेडएसआई, जोधपुर (मछली, पक्षी और हर्पटोफौना पर काम कर रहे हैं), डॉ. जीपा जयवाल, जेडएसआई, हैदराबाद (कार्यरत) जलीय कीड़ों पर), डॉ शांता बाला गुरुमायण, जेडएसआई, ईटानगर (मोलस्का पर काम कर रहे), डॉ अपर्णा कलावती (कीट पर काम कर रहे)। इस कठिन पथ को कवर करने वाली महिला वैज्ञानिकों के मनोबल को बढ़ाने के लिए, डॉ धृति बनर्जी, निदेशक, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया खुद टीम की कमान संभाल रही है।