श्री तुंगल बावा !मांडव्य शहरी!!
(कहानी)
– राजीव कुमार शर्मन्
तुंगल गांव के घुराण स्कूल में ही शंकरदास के पोते का नामकरण तुंगली बावा पड़ चुका था। पोते तुंगली बावा का वास्तविक नाम तिलकराज था । यह बहुत कम सहपाठियों को ही शायद मालूम था। दादाजी शंकर दास के साथ गांव गांव कथा-वार्ता में जब भी स्कूली छुट्टियों या रविवार पर्व त्योहारों में जाने का अवसर मिलता तो तुंगली बावा अवश्य ही जाता था।

शंकर दास ग्रामीण यजमानों के घर बड़े गौरान्वित होकर कहते: देखो! मदन पालसरा जी, “मूल से व्याज प्यारा है”। मदन पालसरा जबावी ब्यान में खुलासा करते! “पंडित जी वह सब ठीक-ठाक है,आपका पोता आपकी तरह धोती कुर्ता पहनने लगा है, पैरों में आपकी तरह हरिजनों के बनायें चमड़े के जूते पहनता है।” एक शिकायत दर्ज करवाने की हिमाकत करता हूं! मदन पालसरे यजमान की शिकायत की बात सुनकर तुंगली बावा पोता सावधान हो गया था।
शंकर दास ने बेवाकी से शिकायत का खुलासा करने को कहा था।
मदन पालसरा बोला पंडित जी आपका तुंगली बावा बहुत ही रौनकी राम, मस्त मौला व हास्य रस पैदा करके चाय- पानी,खाना खाने वालों के नाक मुंह से भोजन पानी निकाल कर लोट पोट कर देता है। पिछली साल श्री सत्य नारायण की कथा पर कोट में जब खिचड़ी परोसी गई तो आपका तुंगली बावा बोलता यह तुंगले भी उल्टे काम करते हैं,देखो ना! खुद तो खिचड़ी में दूध मिलाकर खा लेते हैं और मेरी खिचड़ी में भी दूध मिलाकर सारे स्वाद का मज़ा ही किरकिरा करा दिया। अबकी तुंगली बावा की हंसी का फव्वारा खिलखिलाहट में फूट पड़ा था। वहां पर सभी हंसने लगे थे। शंकर दास ने समझाया! ” देखो तुंगली बावा! जिसका अन्न खाना होता है,उसका गुण गाना होता है”। नहीं तो यजमानों की नाराज़गी का कोप भाजन बनना पड़ता है।” पोता तुंगली राम संभल कर बोला! जी, दादाजी!! “मैंने तभी तो सोचा है कि भरगांव की श्री सुरगणी माता जी का ग्रामीण यजमानों के लिए बहुत बड़ा भव्य मंदिर बनवाऊंगा? देखना! वहां पर बहुत भारी ग्रामीण मेला (जात्तर) लगेगा, उसमें सारी तुंगल घाटी के देवी-देवताओं के साथ साथ श्री मांडव्य शहरी देवी- देवताओं को भी बुलाया जायेगा।।” इतनी बड़ी चार पांच दिनों की जात्तर में जब देवी-देवताओं के ढोल नगाड़ों की थाप पर सभी नाच गाने को झूम उठेगें। दादाजी व मदन पालसरा तुंगली बावा की बातें सुनकर हैरत में पड़कर हंसते कभी विस्मित हो कर रह गये थे। तुंगली बावा का प्रसारण जारी था। हालांकि दादा जी रोकने की कोशिश कर रहे थे। अब मदन पालसरा के साथ साथ और देहाती ग्रामीणों ने भी तुंगली बावा का पक्ष लेकर उसे बेवाकी से बोलने को उत्साहित कर दिया था। हालांकि ग्रामीणों ने बीच में टोका कि यहां पर कोट- कुनतर में कोई परिवहन सेवा उपलब्ध नहीं हैं। चौहार घाटी से आने वाले देवी-देवताओं को मेले में कैसे बुलाया जायेगा? व्यास नदी को तैर कर तो पार नहीं किया जा सकता। इतने आदमी श्री सुरगणी माता मेला भरगांव में कैसे आयेंगे। तुंगली बावा हार मानने वाला नहीं था,बोला! ” मैंने इसका भी पक्का इलाज सोच रखा है, जोगिंदर नगर की रेलवे लाईन को ब्रांड गेज रेलवे लाईन बिछाने की योजना भारत के रेल मंत्री को बताई जाएगी! आप सभी तुंगल घाटी के ग्रामीणों के लिये जोगिन्दरनगर से ” श्री तुंगल घाटी रेल-मेल सीधी कोट-कुनतर के रेलवे पुल को पारकर यहां पहुंच जायेगी।” दादाजी शंकरदास का संयम टूटता जा रहा था। ग्रामीण हंसी से लोटपोट हो रहे थे। तुंगली बावा बोला! जोगिंदर नगर पावर हाउस से बड़ा बिजली घर तो कोट- कुनतर व्यास नदी में बन सकता है। कातकू लम्बरदार बुजुर्ग ने तुंगली बावा को शाबाशी देकर खुला समर्थन कर दिया था। वृद्ध कातकू लम्बरदार बोले! जब जोगिंदर नगर में अंग्रेजों ने बरोट के उहल दरिया को जोगिंदर नगर पहुंचा दिया तो हमारे तो नीलगगनी सागर व्यास दरिया बहता है। यहां तुंगल घाटी की अरनोड्डी,रछौड़ा खड्डों समेत यहां व्यास नदी में बहुत बड़ा बिजली घर तैयार होने से देहातियों का कायाकल्प हो जायेगा। तुंगली बावा बोला, फिर देखना यहां रेलगाड़ी के आने से एक मांडव्य रेलवे एक्सप्रेस को हम मांडव्य शहरियों के लिए भी भेज देंगे। मदन पालसरा जी ने सहमति प्रकट की थी कि उनको जमीनी लगान व अनाज बसूलने के लिए पैदल व घोड़े- खच्चरों पर आना पड़ता है। शंकर दास ने तुंगली बावा को वाणी पर विराम लगाने का आदेश जारी कर दिया था। हालांकि ग्रामीणों को बहुत सारी विकासशील योजनाओं का खुलासा होने की उम्मीद थी। सांयकालीन बेला पश्चात रात्रि के अंधेरे में भरगांव दामोदरदास यजमान के घर पहुंचना था। मदन पालसरा जी से दान दक्षिणा अनाज इकट्ठा करके शंकरदास जी ने दो मण पक्के ( लगभग अस्सी किलो) कनक अपनी पीठ पर व एक मण कच्चा ( लगभग 16 किलो) चावल तुंगली बावा की पीठ पर लादकर द्रुबल गांव की ओर आहिस्ता आहिस्ता सरकने लगे ताकि भरगांव तक जल्दी पहुंच हो जाये। रास्ते में दादाजी शंकरदास जी ने तुंगली बावा को फरमान जारी किया था कि ज्यादा बातुनी व माधोराय का घोड़ा बनने की जरूरत नहीं होती है। यह दुर्गम जटिलताओं वाला इलाका है। यहां अभी बस नहीं पहुंची तो रेलगाड़ी तो अगले सौ सालों तक नहीं आ सकती हैं।
रात्रि का आगमन होते ही दोनों सही सलामत लस्कर-पस्कर के साथ दादा- पोता यजमान दामोदर दास के घर पहुंच गए थे। दामोदर दास ने उनका अनाज बोझा उतरवाया। तुंगली बावा थक चुका था। हालांकि मंढोखर में रास्ते में आराम कर लिया था। बस नीचे चावल उतारने से मण कच्चे का बोरी पत्थर के पक्के आंगण में खिसक कर गिर गया व चावल बिखर गये। दादाजी शंकरदास कुपित हो गये। मूर्ख तुंगली बावा! चला है कोट- कुनतर में पुल व पावर हाउस बनवाने! तुंगल घाटी रेल-मेल और मांडव्य शहरी रेलवे एक्सप्रेस चलाने। महामूर्ख!! एक अनाज का छोटा सा बोरा तो संभाला नहीं जाता। तुंगली बावा का चेहरा लटक गया था। वह गहन चुप्पी धारण कर चुका था। “अरे पंडित जी, जाने दो ना अभी तुंगली बावा बच्चा है ना!” दामोदर दास जी ने एकाएक सारी स्थिति को भांपकर संभाल लिया था। दामोदर दास ने अपनी कबीलदारी के बहु- बेटों से एक दम आंगन से चावल उठाकर छोटे बोरे में डाल कर बोरे का मुंह कसकर बांध दिया था। दामोदर दास की दोनों बहुरानियां लोहे के तसले बाट में गर्मागर्म पानी लाकर उसमें काला नमक ( द्रंग- गुम्मा खानों का लवण) डालकर शंकरदास व तुंगली बावा के पांव धुलाये। इस पानी से पैर धुलवाने से दादा- पोते की सारी थकान दूर हो चुकी थी। दादाजी शंकरदास ने बहुरानियों को अनेकों आशीर्वाद दे दिए थे। दामोदर दास ने सवाल डाल दिया था कि बड़ी बहुरानी के विवाह को पांच साल विवाह को हो गये हैं, कोई औलाद नहीं हुई है। शंकर दास ने अगली सुबह जन्म पत्र टीपड़ा देखने का आश्वासन दिया था।
दोनों को दामोदर दास जी ने मक्की की रोटी, साबुत माह का राजरूपी मस्त मधरा साग-मक्खन से रोटी खिलाई। रोटी खाने के बाद सबने इकट्ठे अलाव की आग ताप्पी और फिर पत्थर की अंगीठी में अंगारे रखकर दादा पोते के कमरे में भी गरमाईश के लिए रख दी थी ताकि रात को सर्दी ना लगे। सोने से पहले दादाजी और तुंगली बावा को पीतल-कलई बंदोबस्त गिलासों में देशी शक्कर मिलाकर दूध पीने को दिया गया था। दादाजी ने तुंगली बावा को खाट पर सुलाकर खुद बाहर दामोदरदास के हुक्का चिलम पीने व बतियाने लगे थे। दादाजी शंकरदास कह रहे थे कि हमारा पुश्तैनी अनाज संग्रहालय भरगांव में ही है। अगर धुंगल ठेकेदार अच्छी रकम दे तो हमने बेच देना है। अंदर तुंगली बावा अभी जाग रहा था। उसने सुन लिया था कि दादाजी भरगांव का अनाज संग्रहालय धुंगल ठेकेदार को बेचने वाले हैं। वह खाट से एकाएक उठकर आ गया। दादाजी आपको पुश्तैनी अनाज संग्रहालय नहीं बेचना है। आपकी शिकायत मांडव्य शहरी पिता जी से कर दूंगा। दामोदर दास जी का सारा कुनवा हंसने लगा था। शंकर दास जी की हंसी भी रुकने का नाम नहीं लेती थी। दामोदर दास ने पूछा: तुंगली बावा तुम्हारे पिताजी तो माडव्य शहरी है। वहां पर नौकरी करते हैं। “तुम हमेशा गांव के घुराण स्कूल में पढ़ते हो”। कालेज में पढ़ाई लिखाई के लिए देर सवेर तो मांडव्य शहरी बनना ही पड़ेगा।। यहां गांव में अभी पचास सालों तक कोई कालेज नहीं बनेगा। अच्छा यह बताओ, इस पुश्तैनी अनाज संग्रहालय का तुम क्या करोगे? तुंगली बावा बोला, “मैं यहां शनि महाराज का बड़ा मंदिर बनवाऊंगा ताकि मेरे यजमानों की सभी समस्याओं की समाप्ति होकर यहां पर सारी सुविधाओं का मिलना दरूस्त हो जाये”। दामोदर दास जी ने दादा जी शंकरदास को समझाया कि आपका पोता श्री तुंगली बावा साधारण बालक नहीं है। यह तो सचमुच तुम्हारे घर में पुराना पूर्वज दादा,पड़दादा, वृद्ध दादा प्रपितामह दोवारा जन्म लेकर आया है जो कि तुंगल घाटी का कायाकल्प करवाने का भी मादा रखता है।शंकर दास जी ने विस्मित होकर दामोदर दास जी को बतलाया कि यह तो वक्त ही बताएगा। दामोदर दास ने तुंगली बावा को सो जाने को कह दिया था। तुंगली बावा खाट पर लेट कर सोच रहा था कि दादाजी कब तक यहां से पैदल चलकर अनाज संग्रहालय में अनाज इकट्ठा करके मांडव्य शहरी सिद्धू आढ़ती को घोड़ों- खच्चरों पर ढोकर बेचते रहेंगे। इससे तो हमारी और ग्रामीणों की गरीबी दूर होने वाली नहीं है। अगली सुबह पंडित भवदेव जी के घर अरन्याणा कोटली में उनके पिताजी का वार्षिक श्राद्ध था। वामनदेव की दुकान पर कोटली अनाज रखवा दिया था। शंकर दास ने अपने छोटे लड़के रामकृष्ण को पटनाल से बुलाया था। रामकृष्ण ने अपने दोस्त सहयोगी धर्म धारी (चारी) को बोलकर दो घोड़ों व दो खच्चरों का इंतजाम कर दिया था ताकि अनाज उनपर लादकर मांडव्य नगर पहुंचाया जा सके।
दादाजी शंकरदास व तुंगली बावा पं भवदेव जी के घर पर उनके पिताजी का वार्षिक श्राद्ध पर भोजन करने चल पड़े। रास्ते में लम्बी पगडंडी थी। झाड़ियों से रास्ता अस्त व्यस्त था। कई जगह पर बरसाती घास अभी तक बरकरार थी। तुंगली बावा की स्वैटर कमीज में घास के कांटे गुम्बर फंस कर चुभने लगे थे। अरन्याणा में पंडित भवदेव जी का मकान आ गया था। तुंगली बावा ने पं भवदेव जी को पहचान लिया था। पंडित भवदेव जी पटनाल में उसका जन्मदिन पढ़ चुके थे। शंकर दास जी व तुंगली बावा के श्रद्धा से पैर धुलाकर भोजन भात परोसा गया। पंडित भवदेव जी पारंगत पंडित विद्वान थे। उन्होंने स्वयं सहस्र शीर्ष का पाठ किया जबकि शंकर दास जी ने विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया था। पंडित भवदेव जी ने शंकर दास जी को पूछा कि पंडिताइन को भी भोजन के लिए लाते। सपत्नीक भोजन ग्रहण करना चाहिए था। यह सब भगवान विष्णु जी का ही ब्राह्मण परिवार होता है। धोती वस्त्र फल दक्षिणा दान देकर पंडित भवदेव जी ने ब्रहामण पूजा की थी। तुंगली बावा को बड़ी श्रद्धा पैदा हो गई थी। उसने दादाजी शंकरदास को पूछा इनके लड़के क्या करते हैं। दादाजी ने बतलाया कि इनके छह लड़के व चार लड़कियां हैं। एक लड़का मंत्री बनने वाला है। लड़कियां मांडव्य नगर में आस पास व ग्रामीण क्षेत्रों में व्याही है। जिस घुराण स्कूल में तुम पढ़ते हो? उसकी जगह भी इन्हीं की परंपरागत बुजुर्ग लाला पुरषोत्तम जी की है।
तुंगली बावा बड़ी हैरत में पड़कर विचार करता रहा था। कुछ सालों के अंतराल में पं भवदेव जी के घर का मंत्री बनने से गांव में सड़क व बस पहुंची तो घुराण स्कूल में जश्न का माहौल था। भरगांव तक बैंड बाजों से जलूस निकाला गया था। कोटली- घुराण स्कूलों के विद्यार्थियों व टीचरों ने भी खूब भांगड़ा डाला था।
ऐसे अब तुंगल क्षेत्र देहाती व मांडव्य शहरीकरण की दूरियां दूर होकर चहुंमुखी सर्वांगीण विकास का सूत्रपात होने लगा था।
सब कुछ सामान्य था। एकाएक शंकर दास के शहरी मकान को एक साज़िश के तहत फर्जीवाड़ा रजिस्ट्रेशन में एक अश्वनी शहरी ने हड़प करने का षड्यंत्र रच डाला था। राजस्व मालिकाना के नाम अपने व भाई के लड़कों के नाम इंद्राज करा दिए थे। शंकर दास ने अपने पुश्तैनी मकान को बचाने के लिए सिर धड़ की बाजी लगा दी थी। इस घटनाक्रम ने पुरोहित- पांडित्य कार्य पर गहरा कुठाराघात किया था। दादाजी शंकरदास ने पंडित भवदेव जी से भी पुरजोर फरियाद लगाई थी।
राजस्व मालिकाना रजिस्ट्रेशन करवाने वाले पड़ोसी अश्वनी कुमार का तर्क था कि यह जगह शंकरदास की विमाता ने मालिकाना हक सरदारों को बेचना था। ठीक है सबने पंडित अश्वनी कुमार जी को सलाह दी कि जितने रुपयों में रजिस्ट्रेशन करवाई है उससे दोगुना रुपयों को बसूल कर गांव व शहर के कर्मकांडी विद्वान शंकरदास जी को उनकी विमाता का राजस्व मालिकाना रजिस्ट्रेशन वापस हस्तांतरित कर दिया जाये।
लालसा का कभी अंत नहीं होता। ना जाने कौन कौन सूत्रधारों सलाह मशविरा देने वालों ने पंडित अश्वनी कुमार जी के पैर धरती पर टिकने ही नहीं दिए।
खैर शंकर दास ने भी दीवानी मुकदमा दर्ज करा संघर्ष का विगुल बजा दिया। इस घटनाक्रम से तुंगली बावा को कर्म काण्ड से मन खिन्न हो गया। तुंगली बावा ने अब दादाजी संग यजमानों के यहां जाना छोड़ दिया था। शंकर दास जी ने लाख समझाया कि यह विष्णु ब्राह्मण की परिपाटी है। तुंगली बावा ने तर्क दिया कि अब भाड़ में जाए यह दुनियावी परिपाटी। एक तरफ बड़ी श्रद्धा से गाय को घास डाल कर पीछे से आरा चला देते हैं।
तुंगली बावा ने अपना धर्म कर्म जारी रखा था। अस्सी के दशक में शंकर दास दादाजी व राजस्व मालिकाना रजिस्ट्रेशन करवाने वाले पंडित अश्वनी कुमार जी का भी देहावसान हो गया तो तुंगली बावा के पिताजी ने न्यायविद सी९ जे० एम० जे०एन० बारोवालिया की सलाह पर पंडित अश्वनी कुमार जी के लड़कों व उसके भाई के लड़कों से रुपयों का आदान-प्रदान कर समझौते का आग्रह किया। यहां पर भी मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना कहावत चरितार्थ हुई। कुछ ने बोला हमने उस पैसों का स्वर्ण खरीदा होता तो लाटरी लग जाती। आप दस गुणा कीमत चुकता करते हो तो देखो बात बन जाती है। तुंगली बावा तैश में आ गये थे। हास्य-व्यंग्य वाण छोड़ते हुए बोले! “पंडित जी, बुजुर्गों से कहते , स्वर्ण ही खरीद लेते। दूसरों को बेघर करने का ठेका क्यों मोल लिया है। मांडव्य शहरी पंडित मनोहर लाल वकील जी ने भी मध्यस्थता करा मुकदमों को हाई कोर्ट में जाने की बजाय पड़ोसियों को घरेलू फैसला करने पर बल दिया था। परिणाम एक दफा फिर शून्य रहा था।
ना जियेगें !ना जीने देंगे !! यह जोर आजमाईश कामयाब रही थी। शंकर दास के वारिसों ने तुंगल घाटी गांव व शहर में मकान तामीर कर अपना बर्चस्व बरकरार रखा है। पंडित अश्वनी कुमार जी के वारिसों ने आज भी दे डिग्री पर डिग्री का राजस्व मालिकाना रजिस्ट्रेशन का नाम बरकरार जरूर रखा है। इस जद्दोजेहद के साठ साल पूरे होने जा रहे हैं। तुंगली बावा के पिताजी, चाचाजी भी परलोक सिधार चुके हैं। दूसरी पार्टी भी काल का ग्रास बनती जा रही है।
तुंगली बावा ने तो दुखी होकर तुंगल घाटी और मांडव्य शहरी होने से किनाराकसी कर रखी थी।
एकाएक मांडव्य शहरी नगर निगम के अस्तित्व में आने पर तुंगली बावा को पुराने मित्रों रिश्तेदारों के धड़ाधड़ दे दनादन फोन आने लगें हैं। कोई कहता है कि समग्र विकासोन्मुखी क्रान्ति आने वाली है। तुंगल घाटी से सटे गांव नये माडव्य नगर निगम में मिल कर औद्योगिक क्रांति का हिस्सा बनने वाले हैं। आप तुंगल घाटी या मांडव्य नगर निगम से चुनावी ताल ठोककर तो देखो?
तुंगली बावा ने एक सूत्रीय फार्मूला सुझाया है कि पहले पुश्तैनी मकान का राजस्व मालिकाना रजिस्ट्रेशन वापस हस्तांतरित करवाने की रकम भुगतान करवाया जाये ताकि परलोक में बेठै शंकरदास जी व पड़ोसी पंडित अश्वनी कुमार जी संतृप्त होकर यजमानों व पुरोहितों को दीर्घ जीवी सुख समृद्धि का उपभोग करने के शुभ आशीर्वाद देकर सरसव्ज बना सके।
हां जी, तुंगली बावा जी ने ऐलान कर दिया है कि वह छद्म वेशी बनकर तुंगल घाटी के पुश्तैनी अनाज संग्रहालय भरगांव,कसाण – पटनाल कोटली , मांडव्य शहरियों से नवीन शहरीकरण बारे मिलकर भविष्य की रणनीति पर गम्भीरता से चिंतन कर रहे हैं।
इसमें तुंगली बावा को लगातार सफलतापूर्वक उपलब्धि हासिल होकर एक नया रिकॉर्ड भी स्थापित हो रहा है।
सोमभद्रा-स्वां नदी बाजार समीप अम्बिकानगर-अम्ब कालोनी रेलवे स्टेशन रोड,अम्ब-ऊना (हि. प्र.)