अमावस्या पर एक साथ करें तीन पीढ़ियों का श्राद्ध,
*देवभूमि न्यूज डेस्क*
पितृ दोष से मुक्ति पाने तथा उनको समर्पित श्राद्ध पूजन का सनातन धर्म में खास महत्व है। 10 सितंबर को शुरू हुए श्राद्ध का पूजन 25 सितंबर तक किया जा सकता है। सनातन धर्म के मुताबिक पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए श्रद्धा के साथ श्राद्ध करना चाहिए। घर में हुई मौत के मुताबिक श्राद्ध करने की तिथि निर्धारित की जाती है।

अमावस्या पर तीन पीढि़यों का श्राद्ध एक साथ कर सकते हैं। इस बारे में ज्योतिषाचार्य पंडित भोला नाथ त्रिवेदी बताते हैं कि पूर्वजों को समर्पित श्राद्ध पूजन करके न केवल उनकी कृपा को प्राप्त किया जा सकता है, बल्कि उनकी आत्मा को शांति के लिए भी यह पूजन महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक अंतिम श्राद्ध यानि अमावस्या के दिन एक साथ तीन पीढि़यों का श्राद्ध किया जा सकता है।
खासकर वह परिवार जिन्हें अपने पूर्वजों के निधन की तिथि का ज्ञान नहीं है, वह अमावस्या के दिन श्राद्ध करके इसका पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं। इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है। उन्होंने बताया कि घर में किसी की मौत के बाद पुण्यतिथि होने तक श्राद्ध नहीं किया जाता। इसके बाद निर्धारित तिथि के मुताबिक श्राद्ध किया जाता है।
इन कारणों से लगता है पितृ दोष
मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की रस्में विधिवत पूरी न होने के कारण।
अकाल निधन हो जाने पर परिवार के लोगों को पितृ दोष का संभावना अधिक रहती है।
मृत्यु के बाद स्वजनों द्वारा पिंडदान, तर्पण व श्राद्ध न करने के कारण।
नाग या इंसान की हत्या करने पर।
पीपल, नीम या बरगद का पेड़ काटना या कटवाने पर।
कैसे करें श्राद्
विद्वान ब्राह्मण द्वारा पितरों के प्रति श्राद्ध करवाना चाहिए। इसमें हवन यज्ञ के उपरांत मंत्रोच्चारण तथा पूजा के उपरांत जल से तर्पण करें। इसके उपरांत कौवे, कुत्ते व गाय के लिए भोजन का अंश निकालना चाहिए। इस दौरान अपने पितरों का स्मरण करें। भोजन के बाद ब्राह्मण को दान दक्षिणा दें। यह श्राद्ध की पूजा सामग्री इस बारे में पंडित दीन दयाल शास्त्री बताते हैं कि पितरों के निमित श्राद्ध के दौरान सामग्री की तैयारी पहले से कर लेनी चाहिए। इसमें जनेऊ, मुशकपूर, हल्दी, देसी घी, शहद, काले तिल, पान का पत्ता, जौ, हवन सामग्री, गुड़, मिट्टी का दीया, अगरबत्ती, रोली, सिंदूर, छोटी सुपारी, रक्षा सूत्र, चावल, गंगाजल, फल, दूध, खीर सहित अन्य सामग्री शामिल है