पितृ पक्ष 2022: श्राद्ध करते समय न करें ये गलतियां, जीवन में छा जाएगा दुर्भाग्य
*देवभूमि न्यूज डेस्क*
पितृ पक्ष अपने समापन के समीप आ गया है। हिंदू व ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध व पिंडदान किया जाता है। जिसके चलते हर कोई इस कार्य को विधि वत रूप से करने में जुटा दिखाई देता है परंतु क्या आप जानते हैं कुछ ऐसे भी लोग होंगे जिन्हें इस दौरान श्राद्ध करने की सही विधि व नियम पता नहीं होते है। तो आपको जानकारी के लिए बता दें कि ज्योतिष शास्त्र में श्राद्ध से जुड़े भी कुछ नियम बनाए गए है। यदि नियमों को ध्यान में न रखकर श्राद्ध किया जाए। तो व्यक्ति पूर्वजों के आशीर्वाद से वंचित रह जाता है। तो आइए जानते हैं, श्राद्ध करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

ज्योतिषियों के अनुसार, पितरों का श्राद्ध करते समय खाली जमीन पर नहीं बैठना चाहिए। इस दौरान रेशमी, कंबल, तृण और कुश आदि के आसन पर बैठकर श्राद्ध करना चाहिए।
आगे आपको बता दें कि श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक होता है। क्योंकि श्राद्ध में तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है। जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है। उसके घर में पितर भोजन नहीं करते।
इसके अलावा श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन परोसते समय दोनों हाथों का इस्तेमाल करें। मान्यता है कि एक हाथ से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं। वहीं श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन कराते समय व्यंजन कैसा बना यह नहीं पूछना चाहिए। माना जाता है जब तक ब्राह्मण मौन रहता है तब तक पितर भोजन ग्रहण करते हैं।
साथ ही साथ इस बात का भी ध्यान रखें कि श्राद्ध के समय यदि कोई भिखारी आए तो उसे वापस न जाने दें। बल्कि उसे आदरपूर्वक घर पर बने सभी व्यंजन खिलाएं। एक और जरूरी बात बता दें कि श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन के बाद पूरे सम्मान के साथ विदा करने के लिए दरवाजे तक जरूर जाएं। कहा जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी बराबर चलते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, श्राद्ध में तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए पांच भाग जरूर निकालें। मान्यता है कि इनके जरिए ही पितरों को भोजन प्राप्त होता है।
तो वही धार्मिक दृष्टि के अनुसार, श्राद्ध में केले के पत्ते पर भोजन भूलकर भी न निकालें। इसकी जगह पर आप कांसे, तांबे या चांदी के पात्र पर भोजन निकाल सकते हैं। अगर ये भी संभव न हो तो पत्तल पर भी निकाल सकते हैं।
बताते चलें कि सायंकाल का समय राक्षसों का माना गया है। ऐसे में शाम या रात के समय श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। इसके अलावा युग्म दिनों यानि कि एक ही दिन दो तिथियों का योग और जिस दिन आपका जन्मदिन हो उस दिन कभी भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए।
इसी के साथ ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक पितरों के लिए कभी भी श्राद्ध दूसरों की भूमि पर नहीं करना चाहिए. यदि किसी के पास स्वयं का मकान न हो तो वह मंदिर, तीर्थ स्थान आदि पर जाकर श्राद्ध कर्म कर सकता है, क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। इसलिए इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है। श्राद्ध कर्म में गाय का घी, दूध या दही शामिल करना जरूरी होता है।
आखिर में बता दें कि श्राद्ध में पितरों का तर्पण भी किया जाता है। इसलिए पितरों को जल देने का समय सुबह 11 बजकर 30 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक का होता है। साथ ही पितरों को जल चढ़ाने के लिए कांसे या तांबे के लोटे का ही इस्तेमाल करें।